लाल पत्थरों से निर्मित विश्व धरोहर स्मारक : लाल किला

लाल किला यूनेस्को द्वारा सरंक्षित “विश्व धरोहर स्मारक” है। लाल पत्थरों से निर्मित होने के कारण इस किले को लाल किला कहा जाता है। हालाँकि किले के कुछ भागों में संगमरमर का भी प्रयोग किया गया है। शाहजहां ने जब अपनी राजधानी को आगरा के बजाए दिल्ली स्थानांतरित किया, तब इसी स्थान पर सत्ता का केंद्र स्थापित किया।

सुनते हैं कि शाहजहां इस किले का निर्माण भी संगमरमर से करवाना चाहता था परंतु राजस्थान से संगमरमर पत्थर ढो कर यहाँ तक लाना आसान न था। इसलिए उसका यह ख्वाब अधूरा ही रह गया।

लाल किला, प्राचीन दिल्ली के सात शहरों में से एक शाहजहाँबाद (शाहजहां द्वारा आबाद किया गया स्थान) में स्थित है। प्राचीन दिल्ली के अन्य छह शहर– किला राय पिथौरा, मेहरौली, सीरी फोर्ट, तुगलकाबाद, फ़िरोज़ाबाद और शेरगढ़ (पुराना किला) हैं। लाल किले में टिकट लेकर आप दिल्ली गेट से प्रवेश करते हैं। लाल किले की प्राचीर पर जाने के लिए इसी गेट के पास से सीढियां (मोदी जैसे नेताओं के लिए) और लिफ्ट (मनमोहन जी जैसे नेताओं के लिए) है। यहाँ प्राचीर पर सदैव तिरंगा फहरता रहता है।

बताते चलें कि दिल्ली में मुख्यतः चार गेट है- दिल्ली गेट, लाहौरी गेट, कश्मीरी गेट, अजमेरी गेट। जो गेट जिस शहर की तरफ खुले उसके नाम पर गेट। दिल्ली की तरफ खुलने वाला दिल्ली गेट, लाहौर की तरफ खुलने वाला लाहौरी गेट। इसमें से दिल्ली गेट और लाहौरी गेट , लाल किले के अंदर है। कश्मीरी गेट, महाराणा प्रताप अंतराज्जीय बस अड्डे के पास है। इसके नाम से कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन भी है। अजमेरी गेट नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास है। एक और पहाड़गंज- दूसरी तरफ अजमेरी गेट।

किले के अंदर दिल्ली गेट के पश्चात छत्ता बाजार (मीना बाजार) आता है। छत्ता बाजार देश का पहला छत युक्त बाजार था। इसमें दुकानदार और खरीदार महिलाएं ही होती थी। वर्तमान में इस बाजार में विभिन्न प्रदेशों के वस्त्र, कलाकृतियां तथा नकली आभूषण आदि मिलते हैं।छत्ता बाजार के पश्चात लाहौरी गेट आता है। लाहौरी गेट के ऊपर के दो तलों को संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया है। इसमें मुग़ल कालिक तथा ब्रिटिश कालिक हथियार, वस्त्र और उपकरण रखे है।

लाहौरी गेट से दीवाने-ए-आम में प्रवेश करते हैं। दीवाने-ए-आम में शाहजहाँ आम जनता से मिलता था। वह संगमरमर से बने ऊँचे सिंहासन पर बैठता था। यहीं पर जनता की फरियाद सुनी जाती थी और अपराधियों को हाथी के पैरों से कुचलवाने, सिर कलम करने जैसे बीभत्स दंड दिए जाते थे। दीवाने-ए-आम के पश्चात शाहजहाँ का नौबत खाना, रंग महल आता है । नौबत खाना यानि संगीत कक्ष। नमाज का वक़्त बताने के लिए यहाँ पर दिन में पांच बार नगाड़ा बजता था। रंग महल यानि बेगम निवास या नूरजहां कक्ष। इस कक्ष में शाही महिलायें और परिवार के अन्य सदस्य रहते थे।

इसके पश्चात विश्वप्रसिद्ध दीवाने-ए-खास आता है। इसमें स्वर्ण जड़ित नक्कासी की गयी है। यहाँ पर शाहजहाँ विशिष्ट लोगों से कोहिनूर हीरा-जड़ित मयूर सिंहासन पर बैठकर मिलता था। सिंहासन का आकार मयूर जैसा है , इसलिए इसे मयूर सिंहासन कहा गया। कोहिनूर हीरा वही हीरा है, जिसे नादिर शाह भारत से लूटकर ईरान ले गया। वर्तमान में यह हीरा ब्रिटेन की महारानी के ताज की शोभा बढ़ा रहा है।

कालजयी पंक्ति——–हमी अस्तो, हमी अस्तो, हमी अस्तो (यदि धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यही हैं, यही हैं, यही हैं) भी इमारत के इसी हिस्से पर लिखी है। हालाँकि यह पंक्ति कश्मीर के संदर्भ में थी।

इसके पश्चात औरंगजेब द्वारा निर्माण करायी गई मस्जिद आती है। सेक्युलर , धिम्मी इतिहासकार लिखते हैं कि वह अत्यंत धार्मिक व्यक्ति था। कुरान की प्रतियां लिखकर तथा टोपी सिलकर बेंचने से होने वाली आय से उसने इस मस्जिद का निर्माण शाही परिवार द्वारा नमाज़ अता करने के लिए करवाया था। इसी मस्जिद के पास यमुना नदी की ओर खुलने वाला गुप्त दरवाजा भी है। अंग्रेजो द्वारा किले पर कब्ज़ा करने के पश्चात अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह जफ़र इसी दरवाजे से निकल भागा था। हालांकि बाद में पकडे गए और अंग्रेजो ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा देकर रंगून में नजरबंद कर दिया था। वही पर उन्होंने अंतिम सांस ली ।

मस्जिद के पश्चात बागे-ए-हयात आता है। हयात यानि स्वर्ग या ज़न्नत। इसमें चौड़े गलियारों के दोनों तरफ हरियाली और फूलों के पौधे होते थे। बाग में पानी बहता रहता था। कुरान में जन्नत की कल्पना में ऐसे ही बाग़ का वर्णन है। बाग़ के एक और सावन तथा दूसरी और भादों इमारत है। यहाँ पर दीप जलाने, संगीत सुनने तथा कृत्रिम वर्षा करवाने की व्यवस्था थी। बादशाह का जब भी बारिश का आनंद लेने का मन करता था, “सावन-भादों ” में चले आते थे। इन सब इमारतों के मध्य में खुले स्थान पर शाम को ‘लाइट एंड साउंड ‘ शो होता है। इस शो में इस किले के इतिहास के बारे में जानकारी दी जाती है।

लाल किला यमुना नदी के तट पर स्थित है। किले के चारों और गहरा, चौड़ा नाला है जिसमें किले की सुरक्षा को अभेद्य बनाने हेतु पानी प्रवाहित होता रहता था। सभी दरवाजों पर लोहे की लंबी, मोटी, नुकीली कीले ठोंकी गयी है ताकि हाथी अपने सिर के प्रहार से इन मजबूत दरवाजों को न तोड़ पाएं। किले के अंदर स्थित बैरकों में पहले मुग़ल सैनिक, तत्पश्चात अंग्रेजी सैनिक और आज़ादी के बाद भारतीय सैनिक रहते थे। सन् 2003 से बैरकों को भारतीय सैनिकों से भी खाली करा लिया गया है।

लाल किला यानी रेड फोर्ट की पहचान मुख्यतः यह है कि प्रति वर्ष 15 अगस्त को भारतवर्ष के प्रधानमंत्री इसी किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते है।देश के पहले प्रधानमंत्री स्व० जवाहरलाल नेहरू ने देश को लाल किले की प्राचीर से सर्वप्रथम 15 अगस्त 1947 को संबोधित किया था। तभी से ये परंपरा अनवरत चली आ रही है। कल इसी लाल किले से प्रधानमंत्री देश को संबोधित करेंगे।

(आशा विनय सिंह बैस)