टी० जी० टी के हिन्दी-साहित्य के प्रश्नपत्र मे बड़ी संख्या मे व्याकरणीय अशुद्धि और ग़लत प्रश्न और उत्तर-विकल्प रहे!..?

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

प्रयागराज। पिछले दिनो टी० जी० टी०-परीक्षा के हिन्दी-साहित्य के प्रश्नपत्र मे सम्बन्धित प्राश्निक (प्रश्नपत्र तैयार करनेवाला) ने बड़ी संख्या मे व्याकरण-स्तर पर तरह-तरह की अशुद्धि की है। प्रश्नपत्र तैयार करनेवाले को विरामचिह्नो का बिलकुल बोध नहीँ है और न ही संस्कृत-साहित्य की कृतियोँ के नाम का। कहाँ उपविरामचिह्न लगेगा; कहाँ विवरण, योजक, निर्देशक और एकल-युगल उद्धरणचिह्न, इनकी समझ प्रश्न लिखनेवाले को है ही नहीँ। खेद है! विद्यार्थियोँ का परीक्षण करनेवाला प्रश्न लिखने की परीक्षा मे स्वयं ही विफल दिख रहा है, जिसकी पात्रता संदिग्ध हो चुकी है।

यह दावा व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने किया है। आचार्य ने दोषारोपित करते हुए बताया है कि ‘विषय-कोड– २’ के अन्तर्गत प्रश्नपत्र का पहला प्रश्न ही पूरी तरह से ग़लत है; क्योँकि प्रश्नात्मक वाक्य के अन्त मे उपविरामचिह्न (:) की जगह विवरणचिह्न (:–) लगेगा। उसमे दिये गये सभी उत्तर-विकल्प ग़लत हैँ। प्रश्न ३ के प्रश्नात्मक वाक्य मे भी विवरणचिह्न होगा।

प्रश्न ७ मे ‘रामचरितमानस’ और ‘वि. संवत् में’ की जगह क्रमश: ‘श्री रामचरितमानस’ ‘वि० संवत् से’ होगा और जिन प्रश्नो मे ‘ई.’ और ‘डॉ.’ दिख रहे हैँ उनमे ‘ई०’ और ‘डॉ०’ होगा; क्योँकि हिन्दी मे मान्य लाघवसूचकचिह्न (०) यह है।प्रश्न १४ मे ‘सद्गुण’ और ‘गुरुजन’ होगा; क्योँकि ‘सद्गुणों’ और ‘गुरुजनों’ अशुद्ध है। प्रश्न १६ मे दी गयी लोकोक्ति ग़लत है; सही है :– “का बरखा जब कृषी सुखानी।” उसमे एकल उद्धरणचिह्न की जगह ‘युगल उद्धरणचिह्न’ का भी व्यवहार होगा। प्रश्न २१ मे ‘हिन्दीध्वनि-विज्ञान (स्वनिम) होगा। प्रश्न २८ मे ‘शेखर: एक जीवनी’ की जगह ‘शेखर : एक जीवनी’ होगा; विसर्ग नहीँ, उपविरामचिह्न प्रयुक्त होगा। प्रश्न ३० मे दण्डी की कृति ग़लत बतायी गयी है, जबकि ‘दशकुमारचरितम्’ है। प्रश्न ३५ मे युगल उद्धरणचिह्न के साथ लिखा जायेगा :– ”चारु चन्द्र की चंचल किरणें…”। प्रश्न ३६ मे ‘हिन्दी-साहित्य’ और ‘विद्वान्’ होगा। प्रश्न ४४ तथ्य और व्याकरण-स्तर पर अशुद्ध है; क्योँकि रचना की कोई विधा नहीँ होती, साहित्य की विधा होती है, फिर ग़ज़ल पद्य-विधा के अन्तर्गत एक विषय है, जिस तरह से कहानी, उपन्यास इत्यादिक गद्य-विधा के विषय हैँ। विधा तो दो ही हैँ :– पद्य और गद्य। विधा और सुमेलन के मध्य मे योजक-चिह्न (-) लगेगा, तभी ‘रचना के सुमेलन’ का अर्थ होगा। इसी प्रश्न के अन्त मे ‘उप-विरामचिह्न’ (:) दिख रहा है, जोकि ग़लत है; वहाँ ‘विवरणचिह्न’ (:–) लगेगा। इसी प्रश्न के उत्तर-विकल्प मे (-) इस चिह्न की जगह ‘निर्देशकचिह्न (–) लगेगा। पुस्तक का नाम ‘दीवान-ए-ग़ालिब’ है, जोकि ग़लत दिया गया है; ‘गालिब’ मे ‘ग’ के नीचे नुक़्त:/नुक़्ता होगा; जैसाकि मूल पुस्तक मे है।

प्रश्न ४६ के उत्तर-विकल्प बी मे ‘चन्दबरदाई’ होगा; ‘व’ नहीँ, ‘ब’ होगा। प्रश्न ५३ मे ‘भारतेन्दु-मण्डल’ होगा। प्रश्न ६६ स्वयं मे ग़लत है। पहली बात, ऐसा कोई व्यक्ति नहीँ है, जिसने देवनागरी लिपि मे की जा रही त्रुटि को सुधारने का प्रयास न किया हो; दूसरी बात, त्रुटि का बहुवचन नहीँ होता, इसलिए ‘त्रुटि’ ही होगा तथा ‘सुधार हेतु’ की जगह ‘सुधार-हेतु’ होगा। ऐसे आपत्तिजनक प्रश्न लिखने से बचना चाहिए।

प्रश्न ७० के उत्तर-विकल्प मे ‘श्रृंगार’ शब्द अशुद्ध है और ‘प्रकृति चित्रण’ भी; ‘प्रकृतिचित्रण’/’प्रकृति-चित्रण’ होगा। प्रश्न ७२ के सारे विकल्प ग़लत हैँ; क्योँकि पुस्तकोँ के नाम ही अशुद्ध हैँ। प्रश्न ७७ मे ‘सात्विक’ की जगह ‘सात्त्विक’ होगा। प्रश्न ८५ मे ‘पद परिचय’ और ‘तत्वों’ की जगह ‘पद-परिचय’ और ‘तत्त्वोँ’ होगा। प्रश्न ९४ का प्रश्नात्मक वाक्य ही अशुद्ध है; क्योँकि उसमे ‘दोष’ शब्द का दो बार प्रयोग है, जोकि ‘द्विरुक्ति-दोष’ है। उसके सारे उत्तर-विकल्प अशुद्ध हैँ; क्योँकि दो शब्दोँ के मध्य योजकचिह्न लगेगा वा फिर दोनो को मिलाकर लिखा जायेगा।

प्रश्न १०२ के उत्तर-विकल्प ग़लत हैँ; क्योँकि ‘रागदरबारी’ गद्य-विधा की पुस्तक है। इनके अलावा आचार्य ने बताया है कि यदि इस प्रश्नपत्र और सूक्ष्मतापूर्वक परीक्षण किया जाये तो अभी दहाई मे अशुद्धि दिखेँगी।
इसप्रकार आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने व्याकरण पर पैनी दृष्टि डालते हुए, कुछ ही प्रश्नो को छोड़कर, शताधिक प्रश्नात्मक वाक्य और उत्तर-विकल्प को ग़लत ठहराते हुए, उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री एवं सम्बद्ध विभाग के अधिकारियोँ से प्रश्नपत्र तैयार करनेवाले और तैयार किये गये प्रश्नोँ के परीक्षण करनेवाले व्यक्ति के विरुद्ध कठोर काररवाई कराने की माँग की है।