मनसा-वाचा-कर्मणा निराला थे, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

१५ अक्तूबर, १९६१ ई० निराला का निधन-दिनांक है।

इलाहाबाद साहित्यकार, कवि-कवयित्रियोँ के लिए विश्रुत रहा है। ऐसे सारस्वत हस्ताक्षर बहुसंख्या मे रहे हैँ, जिनका जन्म कहीँ और हुआ था; किन्तु कर्मस्थल इलाहाबाद रहा है। सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ भी उन्हीँ मे से एक थे। मेदिनीपुर, बंगाल मे २१ फ़रवरी, १८९९ ई० को जन्म लेनेवाले सूर्यकुमार ने ‘सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के रूप मे इलाहाबाद को अपनी कर्मभूमि के रूप मे ग्रहण किया और कर्मयोगी का जीवन जीते हुए, यहीँ पर १५ अक्तूबर, १९६१ ई० को उनकी जीवनलीला भी समाप्त हुई थी। उन्होँने हाईस्कूल तक की शिक्षा ग्रहण की थी, तत्पश्चात् उन्होँने स्वाध्याय करके हिन्दी, बांग्ला एवं संस्कृत-भाषा का ज्ञान अर्जित किया था। आरम्भ में, उन्हेँ हिन्दी का ज्ञान नहीँ था; किन्तु मात्र १५ वर्ष की अवस्था मे मनोहरा देवी के साथ विवाह होना, उनके लिए सुखद रहा। ऐसा इसलिए कि उनकी पत्नी मनोहरा देवी एक सुसंस्कृत और विदुषी थीँ और धाराप्रवाह हिन्दी बोलती थीँ, जिसे सुन-समझ तथा अनुभव कर, सूर्यकुमार की बाँछेँ खिल जाती थीँ। उन्हेँ हिन्दी-भाषा के सन्निकट लाने का श्रेय उनकी पत्नी मनोहरा देवी को ही है।

एक बार की बात है। सोलह वर्षीय सूर्यकुमार और चौदह वर्षीया उनकी पत्नी मनोहरा देवी मे किसी बात को लेकर वैचारिक विवाद हो गया था, जिसका मुख्य कारण था कि मनोहरा देवी चाहती थीँ कि उनका पति हिन्दी-खड़ी बोली विधिवत् सीखे तथा धाराप्रवाह बोले और लिखे। निराला को उनकी यह बात पसन्द नहीँ आती थी। एक दिन वे आपे से बाहर हो आये और बोल पड़े, “तुम हिन्दी-हिन्दी करती हो; हिन्दी मे क्या है?” इस पर उनकी पत्नी ने उत्तर दिया, “जब तुम्हेँ आती ही नहीँ तब कुछ नहीँ है।” निराला ने प्रतिक्रिया की, “मुझे हिन्दी नहीँ आती।” इस पर पत्नी ने निराला को लपेट लिया, “वह तो तुम्हारी ज़बान बतलाती है। बैसवाड़ी बोल लेते हो। तुलसीकृत रामायण पढ़ी है, बस। तुम खड़ी बोली को क्या जानते हो?” इसके अतिरिक्त बहुत सारे घटनाप्रसंग हैँ। निराला की पत्नी मनोहरा देवी के कथासूत्र को समझने के लिए ‘कुल्लीभाट’ को पढ़ना होगा। हिन्दी की महिमा को सुस्पष्ट करते हुए, उसी समय मनोहरा देवी ने सूर्यकुमार को दो गीत सुनाये थे :–

पहला– अगर है चाह मिलने की तो हरदम लौ लगाता जा।
दूसरा– सासु जी का छोकड़ा, मेरी ठोढ़ी पर रख दिया हाथ। बहुत गम खा गयी, नहीँ तो चाँटे लगाती दो-चार।।

मनोहरा देवी प्रयासशील थीँ कि उनका पति हिन्दी-खड़ी बोली बोलना और लिखना सीख जाये। सूर्यकुमार के बात-व्यवहार से मनोहरा देवी समझ चुकी थीँ कि उनके पति उस समय हिन्दी के पूरे गँवार थे। यद्यपि दोनो ही वयस्क थे तथापि मनोहरा देवी की चेतना अपेक्षाकृत अत्यधिक विकसित थी। दोनो मे खटपट होता था; परन्तु मनोहरा की प्रेरणा और उनके सद्प्रयास से निराला उन्हीँ के पास बैठकर हिन्दी-शब्दोँ का वाचन और लेखन करते थे। मनोहरा ने ही उनमे हिन्दीभाषा-परिष्कार के प्रति अभिरुचि जाग्रत् की थी। उन्हीँ की प्रेरणा से निराला ने २० वर्ष की अवस्था मे अपनी प्रथम कृति ‘जुही की कली’ की रचना की थी। सूर्यकुमार जब २३ वर्ष की अवस्था मे थे तब मनोहरा देवी की मृत्यु हो गयी थी।

कालान्तर में, उन्हेँ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का सान्निध्य (‘सानिध्य’ अशुद्ध है।) प्राप्त हुआ था, जहाँ से वे सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के रूप मे चर्चित हुए थे। आचार्य द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ मे १९२० ई० मे ‘बंगभाषा का उच्चारण’ नामक निराला का लेख प्रकाशित किया था। उन्हीँ की प्रेरणा से निराला को ‘श्रीराम कृष्ण मिशन’ की पत्रिका ‘समन्वय’ का सम्पादन-दायित्व सौँपा गया। वहीँ उन्हेँ विवेकानन्द के जीवनदर्शन का बोध हुआ था। उन्होँने ‘सुधा’ का भी सम्पादन किया था। इस बीच, वे इलाहाबाद के तत्कालीन साहित्यकारोँ-कवियोँ के साथ जुड़ चुके थे। वे साहित्यकार-समूह के आग्रह पर १९४२ ई० मे इलाहाबाद आ गये थे।

इलाहाबाद मे उन्हें सर्जन का अनुकूल धरातल मिला था। दारागंज, इलाहाबाद मे पण्डे-पुजारी, मल्लाह, यादव, फल-फूल, साग-सब्ज़ी बेचनेवालोँ के बीच रहते हुए, निराला ‘खाँटी’ निराला बन चुके थे। यही कारण था कि उन्होँने यहीँ रहकर ‘अपरा’, ‘नये पत्ते’, ‘बेला’, ‘अर्चना’, ‘आराधना’ इत्यादिक काव्यकृतियोँ और ‘चतुरी चमार’, ‘सुकुल की बीबी’ इत्यादिक कथात्मक कृतियोँ के प्रणयन किये थे।

प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, वाचस्पति पाठक इत्यादिक साहित्यकारोँ के साथ गहरा जुड़ाव उनके साहित्य-संसार को समृद्ध करता रहा।

महादेवी वर्मा एक प्रकार से उनकी देख-भाल करती थीँ। वे रक्षाबन्धन के अवसर पर प्रतिवर्ष महादेवी के हाथोँ से रक्षासूत्र मे बँध जाते थे। वे उन्हेँ ‘परमहंस’ के नाम से भी सम्बोधित करती थीँ और मानती थीँ। महादेवी वर्मा ने ही बताया था, निराला जी अपने जीवन के अन्तिम समय मे बहुत अवधि तक अस्वस्थ थे। एक दिन उनके शरीर मे असह्य दर्द हुआ। उन्हेँ अस्पताल पहुँचाया गया; परन्तु वहाँ की व्यवस्था देखकर वे लौट आये। उनका कहना था कि जहाँ ग़रीबोँ का इलाज नहीँ हो सकता वहाँ मै अपना इलाज नहीँ कराऊँगा। अस्पताल अमीर लोग के लिए है, ग़रीबोँ के लिए नहीँ। कितना महान् हृदय था उनका!

निराला के पुत्र का नाम रामकृष्ण था। उनके शुभचिन्तकोँ ने जब समझ लिया कि निराला के जीवन का अन्तिम समय सन्निकट है तब उन्होँने निराला से कहा कि वे अपनी पुस्तकोँ की रॉयल्टी अपने पुत्र रामकृष्ण के नाम कर देँ तब उन्होँने जो उत्तर दिया था, वह वास्तव मे वही दे सकता है, जो समीचीन साहित्यकार होता है। उनका उत्तर था, ”क्योँ कर दूँ, रामकृष्ण के नाम; मेरे तो बहुत-से रामकृष्ण हैँ।” यहाँ भी उनका निराला चरित्र उद्भासित होता है।

…. और एक दिन मतवाला, औघड़दानी एवं फक्कड़ महाप्राण निराला १५ अक्तूबर, १९६१ ई० को अपने चाहनेवालोँ को रोता-बिलखता छोड़कर इस दुनिया से कूच कर गये थे, यद्यपि उनका ‘स्वर’ आज भी अन्तिम कृति के रूप मे साहित्याकाश मे गुंजायमान है :–
“अभी न होगा मेरा अन्त,
मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु दिगन्त
अभी न होगा मेरा अन्त।”

वह चित्र-विचित्र व्यक्तित्व जिसने अपने पास के सारे भाव अभावग्रस्त लोग के जीवन मे लुटाता रहा, अपने जीवन के अन्तिम काल मे अभाव मे भी ‘भाव’ का दर्शन करता रहा; अज्ञात परिवेश मे आत्मसंवाद करता रहा; अन्तत:, उसकी आँखेँ मूँदती गयीँ। बाबा नागार्जुन से रहा नहीँ गया और उनके स्वर मुखर हो उठे थे।
“बाल झबरे, दृष्टि पैनी, फटी लुंगी नग्न तन,
किन्तु अन्तर्दीप्त था, आकाश-सा उन्मुक्त मन।
उसे मरने दिया हमने, रह गया घुटकर पवन,
अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन।”

निराला के कक्ष मे काष्ठ का एक बक्सा था, जिस पर सबकी उत्सुकताभरी दृष्टि गड़ी थी। वह बक्सा खोला गया तब मात्र दो वस्तुएँ दिखी थीँ, जिन्हेँ देखते ही वहाँ उपस्थिति सभी जन की आँखेँ फटीँ-की-फटीँ रह गयीँ। ‘जुही कली’, ‘अनामिका’, ‘अणिमा’, ‘अर्चना’, ‘आराधना’, ‘बेला’, ‘नये पत्ते’ इत्यादिक की अमूल्य रसधारा से समाज को सरसानेवाले ‘छायावाद-युग’ का प्रतिनिधित्व करनेवाले, महारानी विक्टोरिया ने जिसके मस्तक पर मुकुट रखा था, वैसे कविर्मनीषी निराला की वही दो वस्तुएँ अमोल थाती रहीँ, जो थीँ :– ‘रामनामी’ एवं ‘श्रीमद्भगवद्गीता’।
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