डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
सत्येंद्र रिटायर हो चुके थे। सेवानिवृत्ति का दिन उनके जीवन में किसी उत्सव की तरह नहीं आया था। न बैंड बजा, न घर के बाहर कोई बड़ा-सा स्वागत हुआ, न रिश्तेदारों की भीड़ उमड़ी। सरकारी स्कूल के छोटे-से कमरे में सहकर्मियों ने औपचारिक विदाई दी थी। न कोई शब्द कहे गए, न एक शॉल ओढ़ाई गयी और न हाथ में कोई स्मृति-चिह्न दिया गया। वर्षों तक जिस स्कूल के दरवाजों का वह ताला खोलते रहे उस दिन उन्हीं दरवाजे से निकलते हुए उनके कदम पहली बार कुछ अनजान-से लगे।
वह चपरासी थे। लेकिन अपनी नौकरी को उन्होंने कभी छोटा नहीं समझा। उनके लिए काम का आकार नहीं, नीयत का आकार मायने रखता था। सुबह सबसे पहले जाकर स्कूल खोलना, सबके आने से पहले कमरों की सफाई देखना, रजिस्टर एक मेज से दूसरी मेज तक पहुँचाना, जब सब चले जाते तो स्कूल मे हो रहे छोटे-बड़े काम को पूरा कराकर ही घर जाना— इन छोटे-छोटे कामों में उन्होंने अपनी पूरी उम्र लगा दी थी। ईमानदारी से। चुपचाप। बिना किसी शिकायत के।
शायद यही उनकी सबसे बड़ी खूबी थी और शायद यही उनकी सबसे बड़ी त्रासदी भी। क्योंकि जिसने जीवन भर सहना सीख लिया हो, दुनिया अक्सर उसके मौन को उसकी कमजोरी समझ लेती है। सत्येंद्र ने भी कभी किसी से कुछ नहीं कहा।
छोटा भाई जब कटु शब्द बोलता, वह चुप रहते। बहनों ने जब अपने स्वार्थ के लिए उन्हें ठुकराया, वह चुप रहे। रिश्तेदारों ने जब उनके चपरासी होने के कारण उनसे दूरी बना ली, वह मुस्कुराकर रह जाते। किसी समारोह में उन्हें पीछे बैठाया जाता तो वह वहीं बैठ जाते। किसी ने उनके बच्चों की सफलता पर आश्चर्य जताते हुए कहा— अरे! चपरासी का बेटा इतना आगे कैसे निकल गया?
तो भी उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। लेकिन मनुष्य का मौन शून्य नहीं होता।
उसके भीतर बहुत कुछ जमा होता रहता है। वर्षों तक। परत-दर-परत और फिर एक दिन वही मौन स्वयं से प्रश्न करने लगता है। रिटायरमेंट के बाद सत्येंद्र के पास पहली बार समय था। बहुत सारा समय।
अब उन्हें सुबह जल्दी उठकर भागना नहीं था। अब किसी अधिकारी के कमरे में चाय पहुँचाने की जल्दी नहीं थी। अब महीने की आखिरी तारीख तक तनख्वाह का इंतजार नहीं था। अब उनके सामने एक ऐसा जीवन था, जिसमें उन्हें पहली बार अपने बारे में सोचने की फुर्सत मिली थी और जब आदमी अपने बारे में सोचने लगता है, तब उसे अपने आसपास के रिश्तों का असली चेहरा दिखाई देने लगता है।
एक सुबह सत्येंद्र बरामदे में चारपाई पर बैठे थे। सामने नीम का पेड़ था। उसकी कुछ पत्तियाँ हवा के साथ धीरे-धीरे गिर रही थीं।
जैदेवी चाय रखकर भीतर जाने लगीं तो सत्येंद्र ने उन्हें रोक लिया।
“जैदेवी।”
“जी?”
“तुमने कभी सोचा है, हमारे जीवन में सबसे ज्यादा समय किस चीज ने लिया?”
जैदेवी ने मुस्कुराकर कहा– संघर्ष ने।
सत्येंद्र कुछ क्षण उन्हें देखते रहे और कहा! रिश्तों ने?
जैदेवी ने गहरी साँस ली। रिश्तों ने समय कम और परीक्षा ज्यादा ली।
सत्येंद्र की आँखें झुक गयीं। तुम्हें याद है, जब मैं नौकरी में नया-नया था? याद क्यों नहीं रहेगा? उस समय घर में राशन खत्म हो जाता था और महीने की तनख्वाह आने में कई दिन बाकी होते थे। तुमने तब भी मुझसे शिकायत नहीं की। शिकायत किससे करती? तुमसे या उस गरीबी से?
“गरीबी से।”
जैदेवी हल्के से हँसीं। गरीबी से शिकायत करने से पेट नहीं भरता, सत्येंद्र। मैंने सोचा, आदमी बचा रहना चाहिए। बाकी सब फिर बनाया जा सकता है।
सत्येंद्र की आँखें भर आयीं। “तुमने मुझे बचाए रखा, जैदेवी।” जैदेवी ने तुरंत बात काट दी। नहीं। मैंने सिर्फ तुम्हें यह याद दिलाया कि तुम टूटे नहीं हो। अंदर कमरे में रखी मेज पर उनके दोनों बेटों की तस्वीरें थीं। आदित्य और राघवेन्द्र। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में आगे बढ़ चुके थे।
आदित्य अध्यापक था। अध्यापन के साथ लेखन में भी उसका नाम देश-विदेश तक पहुँचा था। उसकी किताबें पढ़ी जाती थीं, उसके व्याख्यान सुने जाते थे और शिक्षा तथा समाज पर उसके विचारों की चर्चा होती थी।
बड़ा बेटा राघवेन्द्र आयुर्वेद चिकित्सक था। लेकिन उसने अपने पेशे तक स्वयं को सीमित नहीं रखा। उसने एक विद्यालय की स्थापना की थी और उसे धीरे-धीरे एक ऐसी संस्था में बदल रहा था, जहाँ शिक्षा केवल किताबों तक सीमित न रहे।
दोनों भाइयों की सोच मे कुछ अन्तर था लेकिन उद्देश्य एक था। वह उद्देश्य था शिक्षा। समाज और अपने माता-पिता से मिले संस्कार। धीरे-धीरे विद्यालय का नाम क्षेत्र से बाहर भी पहचाना जाने लगा।
एक शाम दोनों भाई घर आये और आदित्य तथा राघवेन्द्र ने पिता के चरण छुए और पूछा– कैसे हैं, पिताजी!?
“ठीक हूँ।”
आदित्य ने हँसते हुए कहा, “ठीक नहीं हैं। रिटायरमेंट के बाद पिताजी! बहुत सोचने लगे हैं।”
सत्येंद्र मुस्कुराए और बोले सोचना बुरी बात है क्या?
“नहीं,” आदित्य ने कुर्सी खींचते हुए कहा, “लेकिन आपने पूरी जिंदगी दूसरों के बारे में सोचा है। अब अपने बारे में सोचिए। सत्येंद्र कुछ क्षण चुप रहे। फिर बोलेकि आज मै अपने बारे में सोचने बैठा हूँ, बेटा। लेकिन पता चला कि मेरे अपने कौन हैं, यही समझने में पूरी उम्र निकल गई। कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
राघवेन्द्र ने पिता की ओर देखा।
“किसने कुछ कहा है आपको?”
“किसी एक ने नहीं कहा।”
फिर? कुछ रिश्ते बोले बिना बहुत कुछ कह देते हैं। आदित्य आगे झुक आया।
पिताजी!अगर किसी ने आपको दुख दिया है तो हमें बताइए। सत्येंद्र ने सिर हिलाया। नहीं। तुम दोनों मेरी लड़ाई मत लड़ना।
राघवेन्द्र की आवाज भारी हो गयी। लेकिन आपकी लड़ाई आपकी अकेली कैसे हो सकती है? क्योंकि बेटा, सत्येंद्र ने धीमे स्वर में कहा, “कुछ लड़ाइयाँ लड़कर नहीं, समझकर खत्म करनी होती हैं और जो लोग बार-बार वही चोट दें?
सत्येंद्र ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा— तब उनसे लड़ना नहीं चाहिए। उनसे दूरी बना लेनी चाहिए। क्योंकि जब किसी की गलती एक बार होती है तो वह गलती है। दूसरी बार होती है तो भूल। लेकिन जब वही गलती बार-बार होने लगे, तो वह आदत बन जाती है। और गलत आदतों को रिश्ते का नाम देकर ढोना अपने ही मन पर अत्याचार है। आदित्य ने पिता का हाथ पकड़ लिया।
आपने इतना सब अकेले सहा क्यों? सत्येंद्र कुछ क्षण तक उसकी हथेली देखते रहे और बोले क्योंकि मुझे डर था कि अगर मैंने शिकायत की, तो तुम दोनों के मन में लोगों के प्रति नफरत पैदा हो जाएगी।
“लेकिन आपने तो हमें सिखाया कि अन्याय सहना भी गलत है।”
“हाँ।”
“तो फिर आपने क्यों सहा?”
सत्येंद्र की आँखों से एक आँसू निकलकर गाल पर ठहर गया। क्योंकि उस समय मैं सिर्फ पिता था। आदमी नहीं। दोनों बेटे स्तब्ध रह गए।
जैदेवी दरवाजे के पास खड़ी सब सुन रही थीं। उन्होंने धीरे से कहा— और यही तुम्हारे पिता की सबसे बड़ी भूल थी। सत्येंद्र ने उनकी ओर देखा। तुम भी?
“हाँ,” जैदेवी बोलीं, “तुमने बच्चों को बचाते-बचाते खुद को बहुत पीछे छोड़ दिया।” कुछ देर कोई कुछ नहीं बोला। बाहर अँधेरा गहराने लगा था।
राघवेन्द्र ने धीरे से कहा— पिताजी! रिश्ते खून से बनते हैं या व्यवहार से?” सत्येंद्र ने खिड़की के बाहर देखा। खून रिश्ते बनाता है, व्यवहार उन्हें जीवित रखता है।
आदित्य ने पूछा— और अगर व्यवहार मर जाए? सत्येंद्र ने गहरी साँस ली और कहा तो रिश्ता केवल नाम रह जाता है।
उस रात सत्येंद्र देर तक सो नहीं सके। उन्होंने अपनी पुराना संदूक खोला। उसमें कुछ पुराने पत्र थे। पीले पड़ चुके कागज, जिन पर समय की धूल जम गई थी। कुछ रिश्तेदारों के पत्र थे, कुछ भाई के, कुछ बहनों के। एक पुरानी तस्वीर भी थी—जिसमें वह, जैदेवी और दोनों बच्चे बहुत छोटे थे।
उन्होंने तस्वीर उठाई। तस्वीर में वह मुस्कुरा रहे थे। लेकिन उन्हें लगा जैसे उस तस्वीर वाला आदमी उनसे कुछ पूछ रहा हो। क्या तुमने अपना जीवन ठीक से जिया? सत्येंद्र ने आँखें बंद कर लीं।
उनके भीतर से उत्तर आया— मैंने अपना जीवन निभाया है और शायद जीवन जीने और जीवन निभाने के बीच यही सबसे बड़ा अंतर था।
अगली सुबह उन्होंने एक निर्णय लिया। अब वह अतीत से शिकायत नहीं करेंगे। वह रिश्तों का हिसाब करेंगे, लेकिन बदला लेने के लिए नहीं; समझने के लिए।
किसने साथ दिया, किसने केवल जरूरत में याद किया, किसने उनकी गरीबी देखी, किसने उनके चरित्र को देखा, किसने उनके पद को सम्मान दिया और किसने उनके मनुष्य होने का सम्मान किया।
सत्येंद्र ने डायरी खोली और पहला वाक्य लिखा— “सम्बन्ध तब नहीं टूटते जब लोग दूर चले जाते हैं। सम्बन्ध तब टूटते हैं, जब गलतियाँ आदत बन जाती हैं और आदत को निभाना रिश्ते से बड़ा हो जाता है।”
उन्होंने कलम रोक दी।
फिर दूसरी पंक्ति लिखी— “अब मैं किसी से नाराज़ नहीं हूँ। अब मैं केवल यह समझना चाहता हूँ कि मेरे जीवन में कौन अपना था और कौन केवल मेरे अपने होने का लाभ उठाता रहा।”
बरामदे में बैठी जैदेवी ने उन्हें लिखते हुए देखा।
“क्या लिख रहे हो?”
सत्येंद्र ने डायरी बंद कर दी।
“अपनी कहानी।”
जैदेवी मुस्कुराईं।
“इतनी देर से?”
सत्येंद्र ने उनकी ओर देखा। “हाँ। क्योंकि अब पहली बार मेरे पास सच लिखने का समय है।”
नीम की एक पत्ती टूटकर उनके सामने आ गिरी। सत्येंद्र ने उसे उठाया, हथेली पर रखा और बहुत देर तक देखते रहे। उन्हें लगा—कुछ रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं। पेड़ से जुड़े रहते हैं, जब तक हवा उन्हें सहारा देती रहती है। फिर एक दिन हवा बदलती है और पत्ता समझ जाता है कि उसका गिरना पेड़ की हार नहीं है। कभी-कभी वह केवल यह स्वीकार करना होता है कि जिस शाखा पर जीवन भर टिके रहे, वह अब अपने लिए पर्याप्त नहीं रही।
सत्येंद्र ने आसमान की ओर देखा। आज पहली बार उन्हें अपने रिटायर होने का दुख नहीं था। उन्हें लग रहा था कि नौकरी से तो वह कल रिटायर हुए हैं— लेकिन दूसरों को खुश करने की नौकरी से शायद वह आज रिटायर हुए हैं।