“डॉ० कलाम जी की ललक हिन्दी सीखने की बनी रही”– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

प्रयागराज। ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से भारत के पूर्व-राष्ट्रपति एवं प्रौद्योगिकीविद् डा० ए० पी० जे० कलाम के जन्मदिनांक १५ अक्तूबर को ‘सारस्वत सदन’, प्रयागराज से एक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया।

पुणे से विज्ञानी सुधाकर उपाध्याय ने बताया– कलाम साहिब अद्भुत प्रतिभा के धनी थे। हम विज्ञानियोँ का मार्गदर्शन करते समय उन्होँने कभी अपने प्रभुत्व को प्रभावी नहीँ होने दिया था। वे अत्यन्त सहजता के साथ हमे कार्य करने के लिए प्रेरित करते थे।

हैदराबाद की विज्ञानी सुधा नौटियाल ने कहा– उनके व्यक्तित्व मे सहजता के साथ आकर्षित करने की एक अदृश्य शक्ति थी। सचमुच, वे हम सबके पथ-प्रदर्शक थे।

आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया– अग्रज डा० कलाम जी हिन्दी सीखना चाहते थे। जब मै उनकी टूटी-फूटी हिन्दी को शुद्ध करता था तब लगता था कि हिन्दी-अभिव्यक्ति के स्तर पर उन्हेँ अभाव खटक रहा था। एक अध्यापक की भूमिका मे जब मै उनके सामने होता था तब वे एक गम्भीर विद्यार्थी-सा लगते थे। एक घटनाप्रसंग के दौरान मेरे गाल पर एक आत्मीय चाँटा मारते हुए, वे बोल पड़े थे :– पाण्डे! तू मेरा ट्यूटर बन जा। डा० कलाम जी की ललक हिन्दी सीखने की बनी रही। अब तो स्मृतिशेष है।

दिल्ली से विज्ञानी डा० एस० के० शर्मा ने बताया– उन्हेँ योँ ही नहीँ ‘मिसाइलमैन’ कहा जाता है। वे किस यन्त्र और उपकरण मे किस प्रकार के कल-पुर्जे लगने चाहिए और उसका प्रभाव कहाँ तक रहेगा, इसकी गम्भीर जानकारी रखते थे। उनमे परीक्षण और निरीक्षण करने की अद्भुत क्षमता थी।