— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
देख! बूढ़वा कइले बा अनेत, मुअला पर पनियो ना जुरी। ऊ दुरगतिया होखी ओकर, हेनर-बेनर सब होइ ओकर। ओकरा के जेतना सराप ओतने कम बा। अचक बान आई आ ओकरा के सुता जाई। काहें से कि बाड़ा मनसहकल होइ गइल बा। बूझ ता कि ऊ कौउआ के जिभिया खाइ के आइल बा। दैव कब आपन चक्कर चलइब, जेसे कि उ सार के टिकसवा कटि जाउ।
पीपर के फेड़वाँ के बरहम बाबा! तू केने उधियाइल बाड़? निसतनिया के गरदनिया दाबि के कुल्हि खेलवा के खतम कर, ना त ऊ मटिलगना, जियहूँ ना दीही आ मुअहूँ ना दीही। ओसे पहिले कवनो रतिया ओ निसतानिया के छतिया पर हहियाइ के चढ़ु आ जबले ओ सार के पारान ना निकले तब ले धँसकइले रह।
आ साँप-गोजर, बिच्छी! केने बाड़ू स? सेकराहे-सेकराहे ओ रँड़ुआ आ भँड़ुआ के गतर-गतर में जहरिया उतारि द स।
आ ए मितर कोरोना! ‘कोविड– १९’ के एकलगी बिषणुआ ओ निरदई के देहिया में घुसाई के हमनी के बाचा ल।
जय हो धरती माई! तहार ओरदाई बढ़ि जाई जब ए कलिजुग के बाड़का पपिया के उठाइ लेबू। का हो बरखा आ बिजुरी रानी! अरे अचके ओ सार के मुड़िया आकासवा के फटाव आ बिजुरी ओकरा देहिया पर गिराव ना।
जय हो सितालो मइया! अचक बान भेज।
अरे देसवा के गढ़वा-गुढ़ई! बाड़ा दियानत बिगड़लेबा। ओ पपिया के गोड़वो सब दिन खातिर मुरकाइ दँ सँ।
जय हो परकिरित महारानी! अँखिया खोल आ आपन चमतकरिया के पिटरिया खोल आ ओकर “रामनाम सत कर”।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ अगस्त, २०२० ईसवी।)