सोचा था तुमने, बहल जाऊँगा?

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

सोचा था तुमने, पिघल जाऊँगा,
सोचा था तुमने, बदल जाऊँगा।
शर्तों पर तुमने, थमाया झुनझुना,
सोचा था तुमने, बहल जाऊँगा?
गिरायी जो बिजली, रही बेअसर,
सोचा था तुमने, दहल जाऊँगा?
फ़ौलादी सीने मे, राज़ हैं बहुत,
सोचा था, तुमने निगल जाऊँगा?
छीने हो चैन औ’ परीशाँ भी तुम्हीं,
सोचा था तुमने, सँभल जाऊँगा?
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १५ जून, २०२२ ईसवी।)