छोटे शहरों में रहने वाले माता-पिता यह पोस्ट ध्यान से पढ़ें….

कोमल गुप्ता ‘चिदर्पिता’-


माता-पिता को लगता है कि अपने बच्चे को सब कुछ सबसे बेस्ट दें… इस सब कुछ कि लिस्ट हर किसी के लिए अलग-अलग है…. कुछ के लिए इस सब कुछ में खाना है, तो कोई स्कूल को सबसे उपर रखता है….
मैं अच्छी सेहत को सबसे उपर रखती हूँ… न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक भी…
पंद्रह दिन पहले हम ndtv के ऑफिस में थे…. एक बड़े शो की एंकर ने व्यक्तिगत बातचीत के दौरान मुझसे पूछा कि आप मुझे प्लीज़ बताइए कि आप अपने बेटे को कैसे पालती हैं? आपके बेटे को देखकर मैं नर्वस हो रही हूँ… मेरी बेटी दिल्ली में पली है, इसी की उम्र की है, पर यदि मैं उसे ऑफिस ले आऊँ तो वो एक कोने में बैठी रहेगी… किसी से बात तक नहीं करेगी… जबकि मेरा बेटा पूरे ऑफिस में दौड़ लगा रहा था, हर किसी की सीट पर जाकर उन्हें हाई फाइव दे रहा था… सबसे हेलो कर रहा था, कहने से नमस्ते भी कर रहा था… कुछ लोग जो बहुत पसंद आये उनके गले लगकर मिल रहा था… जबकि वह वहां पहली बार गया था….
मैं तो जानती हूँ अपने बेटे को, पर उनके लिए ये अचरज था कि बदायूं से आया बच्चा उनके दिल्ली के बच्चों पर भारी है….
अभी कल ही एक भाई ने मुझसे इनबॉक्स में पूछा कि दीदी छोटे शहर में हम अपने बच्चे को क्या दे सकते हैं? बाहर भेजते डर लगता है….
पहले यह देखिये कि बाहर ऐसा क्या है जो आपके शहर में नहीं है…
मैंने अपने बेटे के लिए शहर का बेस्ट स्कूल चुना है… स्कूल चुनते हुए एक्टीविटी पर अधिक ध्यान दिया क्योंकि पढाई तो वो पहले ही घर से सब करके गया है… मेरे शहर में पार्क आदि नहीं हैं और मैं अपने बच्चे को सड़क पर खेलने नहीं भेज सकती.. तो मेरे दिमाग में क्लियर था कि बच्चे को सामाजिक रिश्ते और खेलने के लिए खुली जगह के कारण स्कूल भेजना है…. वो मिल रहा है….
इसके अलावा मैंने बचपन से ही उसे youtube videos दिखाए…. अब वो वह सब कुछ जानता है जो इस उम्र का कोई भी बच्चा जान सकता है…. हम delhi गए तो वो खुद ही अपने वीडियो वाली बस और मेट्रो ट्रेन को देखकर पहचान गया… इन्टरनेट के ज़माने में आप उसके सामने पूरी दुनिया खोलकर रख सकते हैं…
अब दूसरे नजरिये से देखिये… मैं जब बदायूं रहने आई तो यहाँ के बंदरों की आक्रामकता देखकर हैरान थी…. मैंने पहले कभी इतने हमलावर बन्दर नहीं देखे थे….मैं डरती थी… हफ्ते में तीन बार बन्दर मुझे दौड़ाते थे और मैं चीखकर अन्दर भाग आती थी… जब बेटा लगभग १० महीने का हुआ तो वह मेरा डर समझने लगा… मैं चीखती तो वो रोता… ऐसा दो बार हुआ…. मैं चिंतित हो गई। मैं अपना डर अपने बेटे को नहीं देना चाहती थी… दूसरी बार के बाद मैंने डंडा उठाया और बन्दर को भगा दिया… अब आर्जव हंसकर ताली बजा रहा था… अब तो वो खुद ही बन्दर भगा देता है….. मैंने बचपन से ध्यान दिया कि उसके अन्दर डर न बैठे किसी चीज़ को लेकर… आपको क्या लगता है कि आपके बच्चे के लिए आपके सिवा कोई और ये कर सकता है? नौकर केवल लापरवाह ही नहीं होते बल्कि आपके बच्चे को लेकर बहुत डरे भी रहते हैं… बच्चे रोते हैं तो उन पर इल्जाम लगते हैं….. उससे बचने के लिए वे बेचारे हर सम्भव प्रयास करते हैं कि आपके बच्चे न रोयें…. इस प्रयास में बच्चे बिगड़ जाते हैं…. बच्चे को बैलेंस्ड इमोशनल सिक्योरिटी केवल माता-पिता ही दे सकते हैं… हॉस्टल, स्कूल, नौकर क्या… दादी-नानी-मामा-मौसी तक नहीं….
तो आप भी उम्र के हिसाब से प्राथमिकतायें तय करें… बच्चे को भरपूर अवसर दें… यदि वह काबिल है तो दिल्ली क्या हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की स्कोलरशिप ले आएगा….
आप मुझसे इनबॉक्स में पूछेंगे तो पहले ही बता देती हूँ, कि मेरी प्राथमिकताओं की लिस्ट में सबसे पहले नंबर पर है, उसका
स्वास्थ्य, जिसके लिए मैं एक टांग पर नाचती हूँ…
दूसरे नंबर पर उसकी स्मार्टनेस, जिसके लिए मैं उसे अपडेट रखती हूँ…. इंग्लिश पर भी शुरू से ध्यान दिया है ताकि उसमें कोई हीनभावना न रहे…
तीसरे नंबर पर उसकी स्टेज पर्फोर्मांस जिसके लिए मैं खुद उसे तैयार करुँगी…
चौथे नंबर पर पढाई और ग्रेड….
पांचवें नंबर पर कैरियर जिसके लिए वो खुद चिंता करेगा…..
इस पोस्ट को लिखने के लिए आज लम्बे समय बाद लैपटॉप पर बैठी हूँ…. फ़ोन पर इतना टुकुर-टुकुर नहीं होता मुझसे…. सो स्पेशल थैंक यू तो बनता है आपकी और से…  अपने बच्चों को मेरा प्यार दीजियेगा….