डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
‘कर’ ‘नाटक’ अपने-अपने उस्ताद के साथ जम्हूरे पहुँच गये हैं; ,वहीं हमने भी अपने उस्ताद और जम्हूरे भेज दिये हैं।
“तो बोल जमूरे!”
“हाँ ओस्ताद!”
“जमूरे! ‘कर’ ‘नाटक’ का चुनावी बुखार क्या कहता है?”
“ओस्ताद! टेम्परेचर बड़ा हाई है।”
“मतलब?”
“मतलब, दोनों आई०सी०यू० में लेटे हैं।”
“मतलब?”
“काँग्रेसी और भाजपाइयों के हाथ-पाँव फूल रहे हैं।”
“मतलब?”
“अरे ओस्ताद! दोनों अकल की सवारी पर बैठे हैं; मगर हैं पैदल।”
“जमूरे!”
“हाँ ओस्ताद!”
“पहेली ना बुझा। साफ-साफ बक दे।”
“बकता हूँ, ओस्ताद। दोनों को सौ से ऊपर की बीमारी है। भाजपाइयों को १२५ डिग्री की है और काँग्रेसियों को सौ से ऊपर की।”
“और जमूरे! ‘जे०डी० (एस०)’ का हाल बता।”
“ओस्ताद! ‘जे०डी० (एस०) की चाँदी है।”
“जमूरे! खुल के बता।”
“ओस्ताद! जे०डी० (एस०) दोनों के बिस्तर के नीचे लेटा है और मौक़ा-मुआयना कर रहा है।”
“जमूरे!”
“हाँ ओस्ताद!”
“किंग मेकर बता।”
“ओस्ताद! जे०डी० (एस०)।”
“जमूरे! मुसलमान किधर?”
“उस्ताद! बताने में डर लगता है।”
“क्यों बे! डर किसका?”
“ओस्ताद! वे सब आयेंगे और कहेंगे : दूसरे की ज़मीन पर तू खेला क्यों खेल रहा? तू इसी तरह से खेला दिखाते-दिखाते ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लेगा।”
“जमूरे!”
“हाँ, ओस्ताद!”
“शीशी निकाल!”
“निकाल लिया ओस्ताद!”
“अब तू ‘आई०सी०यू०’ में सीधे घुस जा।”
“घुस गया उस्ताद।”
“अब उस मोटू को पूरी शीशी सुँघा दे।”
“सुँघा दिया ओस्ताद!”
“जमूरे!”
“हाँ ओस्ताद!”
“अब दूसरी शीशी निकाल।”
“निकाल लिया ओस्ताद।”
“वो जो वंश-परम्परा का शाहजादा लेटा हुआ है, उसे आधी शीशी सुँघा, वरना गजब हो जायेगा।”
“वैसा ही करता हूँ, ओस्ताद।”
“जमूरे!”
“हाँ ओस्ताद!”
“अब तू चला आ।”
“जी, अच्छा ओस्ताद।”
“जमूरे!”
“जी ओस्ताद!”
“अब अपना तम्मू (तम्बू) उखाड़ और चल यहाँ से।”
“अभी उखाड़ता हूँ, ओस्ताद!”
“ठीक से उखाड़ना, ताकि कुछ बचे नहीं।”
“जी ओस्ताद! उखाड़ने के लिए पी-एच०डी० मिल चुकी है।”
“अच्छी तरह से उखाड़ेगा तो तुझे ‘डी०लिट्० भी मिल जायेगी।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; ९ मई, २०१८ ई०)