“आरम्भो न्याययुक्तो यः स हि धर्म इति स्मृतः।”
यानि न्याय से युक्त होने पर ही धर्म का प्रारम्भ होता है यही बात याद रखने योग्य है।
अब उपरोक्तानुसार आप विचार कीजिये क्या वर्तमान किसी भी धर्म/समुदाय मे न्याय के लिए कोई स्थान है?
शायद नहीं, तो फिर क्यों जनता को न्यायविहीन धर्म/समुदाय के बिना धार्मिक बनाया जा रहा है?
यदि व्यवस्था में न्याय नहीं है तो क्यों ऐसी व्यवस्था को जनता के ऊपर थोपा जाता है?
केवल जनता को उसके न्यायशील चारों जनाधिकार (शिक्षा/रोजगार/सुविधा/संरक्षण) दे दो वह खुद ही धार्मिक हो जायेंगें।
लेकिन धर्म तो कैद है मंदिर के घंटे मे, मक्का की मजार मे, चर्च मे गुरुद्वारे में और ना जाने कहाँ-कहाँ।
धर्म
(सत्य/प्रेम/न्याय/पुण्य)
सभी प्रकार के सुखो का एकमात्र श्रोत्र है, और वर्तमान में कोई सुखी विरला ही दिखता है यानि धर्म तो है पर धार्मिकता कही विलुप्त है।
★व्यक्तिगत जीवनचर्या मे सत्यनिष्ठा व सत्यानुशासन ही धार्मिकता है।
★परिवारिक जीवनचर्या मे प्रेमनिष्ठा व प्रेमानुशासन ही धार्मिकता है।
★समाजिक जीवनचर्या मे न्यायनिष्ठा व न्यायानुशासन ही धार्मिकता है।
★सार्वभौमिक जीवनचर्या मे पुन्यनिष्ठा व पुण्यानुशासन ही धार्मिकता है।
संक्षेप मे चतुष्पदीय धर्म इतना ही है।
विस्तृत जानकारी के लिए अपने सामुदायिक ग्रंथों को पढ़िए व समझिये ज़िसमे वर्तमान मे चल रहे सभी धर्मो की धार्मिकता को धर्म की तुला पर तौला गया है और सभी धर्मो का सार उपरोक्त चार बाते ही है यही सिद्ध हुआ बताया गया है।
✍🇮🇳 राम गुप्ता, स्वतन्त्र पत्रकार, नोएडा