काशी के अविमुक्तेश्वर महादेव मंदिर की दशा

एक होती है मुक्ति। दूसरी विमुक्ति। इन दोनों के पार है अविमुक्ति। ये सिर्फ काशी में मिलती है। इसीलिए बनारस मने काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है। इस अविमुक्ति का सीधा संबंध भगवान अविमुक्तेश्वर से है। अविमुक्तेश्वर महादेव शिव के गुरु हैं। अपने यहां सांसारिक लौकिकता से मुक्ति और शिव से अविमुक्ति की अवधारणा सदियों पुरानी है। इसीलिए लोग काशी में मरने आते हैं क्योंकि यहां जो मोक्ष मिलता है, वो सामान्य मोक्ष नहीं है। शिव के संरक्षण वाला मोक्ष है, अविमुक्ति है, जहां मरने से पहले विषयी के कान में आकर गुरु फुसफुसा जाते हैं- बहुत हो गयल, अब चला गुरु!

पिछले हफ्ते काशी में अविमुक्तेश्वर महादेव का मंदिर तोड़ दिया गया। विश्वनाथ मंदिर के प्रांगण में दक्षिणी दरवाजे पर जहां नंदी बैठे हैं, वहां अविमुक्तेश्वर महादेव हुआ करते थे। विकास उनको निगल गया। बनारस चुप रहा। बीते तीन साल में ऐसे ही तमाम विग्रहों को तोड़ा गया और शिव के इस विशिष्ट मुक्त क्षेत्र को आधुनिक विकास का बंधक बना दिया गया, लेकिन बनारस चुप रहा। आज शिवरात्रि के मौके पर शिवलिंग के स्पर्श दर्शन पर रोक लगी हुई है, फिर भी बनारस चुप है। उत्सवरत है।

आज वे तमाम लोग शिवरात्रि मना रहे हैं जिन्हें नहीं पता कि राजा दिवोदास के बाद सदियों में एक दूसरा राजा आया है जिसने काशी से शिव को विस्थापित कर दिया है। काशी को बंधक बना लिया है। उन सब को शिवरात्रि वैसे ही मुबारक जैसे होली या दीवाली या न्यू ईयर। औपचारिकता है, शुभकामनाएं लीजिए।

शिव ने कभी नहीं सोचा होगा कि उनके भक्त इतने बेगैरत हो जाएंगे कि गुरु का मंदिर टूटने पर भी नहीं जागेंगे। शिव हमारे कल्याण के लिए तांडव कर सकते हैं लेकिन जब हम ही अपने अच्छे बुरे के प्रति अनभिज्ञ रहे, तो अकेला शिव क्या करेगा भला। हर राजा अपनी कांस्टीट्यूएंसी के बल पर जीता है। शिव की प्रजा उसी दिन उनसे विमुख हो गयी थी जब काशी में हर हर मोदी का नारा आया था। सात साल से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद समझाए जा रहे हैं। अब लगता है बहुत देर हो चुकी है। शिव अकेले पड़ गए हैं। नंदी टूटे पड़े हैं एक कोने में।

मंदिर तोड़े जाने के अगले दिन एक दोस्त के माध्यम से मंदिर के महंत जी से बात हुई। वे दुखी थे कि एक आवाज़ नहीं उठी इस कुकृत्य के विरोध में। मैंने पूछा, स्वामीजी तो लगातार लिख-बोल रहे हैं। वे बोले, यही तो विडंबना है कि लोग ब हर हर महादेव की जगह हर हर मोदी कहने लगे तो शिव को और उनके भक्तों को विस्थापित होना ही है।

(जनपथ के संपादक Abhishek Srivastava जी की वॉल से साभार,
तस्वीर सुरेश प्रताप सिंह जी की पोस्ट से साभार)