डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
एक : ठिठकते पाँवों को ज़मीं से बढ़ाते चलो,
ठिठुरती अँगुलियों को हरकत में आने दो।
दो : लपकते शोलों को छूकर मैं देखा करता हूँ,
तुम मुझे अँगारों की तासीर क्या बताओगे?
तीन : वह बुज़दिल है, बुज़जिगर१ है और बुज़गीर२ भी,
बुज़ुर्गवार३ और बुज़ुर्गमनीश४ ऐसा कहते हैं।
चार : बुज़दिल छिपकर शिकार किया करते हैं,
बहादुर हो तो सीना तानकर सामने से मिलो।
पाँच : हमने ज़ालिम ज़माने से जमकर लड़ना सीखा है,
डरने की बात कैसी, मौत होठों को चूमा करती है।
शब्दार्थ : १- कायर २- छली ३- पूज्य ४- पुनीत आत्मा।