बहुत याद आते हो मेरे प्यारे कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव

चार साल हो गए फिर भी मैं सोच रहा हूं कि स्टैंड अप कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव के जाने का इतना दुख क्यों है मुझे?? 😢😢

क्या इसलिए कि वह एक हास्य कलाकार थे?

लेकिन हास्य कलाकार तो और भी हैं।

नहीं, यह कारण तो कदापि नहीं है!!

मुझे लगता है कि राजू श्रीवास्तव के जाने का दुख आज भी मुझे इसलिए है क्योंकि वह फूहड़, कुंठित और एजेंडा वाला हास्य नहीं परोसते थे। उनका हास्य साफ-सुथरा था, जिसे परिवार के साथ बैठकर देखा जा सकता था।

उनके जाने की पीड़ा इसलिए भी है कि उन्होंने प्रसिद्धि किसी गॉडफादर की कृपा से नहीं पाई, बल्कि अपनी प्रतिभा और अथक मेहनत से हास्य कला के क्षेत्र में अपना ऊँचा स्थान खुद बनाया। वह हम सबके बीच के, एक सामान्य परिवार के व्यक्ति थे। इसीलिए वह हमारे आसपास की छोटी-मोटी घटनाओं – शादी-ब्याह, लोकल ट्रेन, बाबा के प्रवचन में ही हास्य ढूंढ लेते थे।

सजीव को छोड़िए, ट्यूबलाइट, पंखा, भोजन की थाली, मिर्च जैसी निर्जीव चीजों के माध्यम से भी वह दर्शकों को गुदगुदा दिया करते थे।

उनके जाने की कसक इसलिए है क्योंकि उनका हास्य आमजन का हास्य था। उनका हास्य तनावग्रस्त पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी वर्ग को तो तनाव-रहित करता ही था, साथ ही गांव-गिरांव के लोगों को, ठेले-खोमचे वालों को, सब्जी बेचने वालों, रिक्शा-टेंपो वालों को भी कनेक्ट करता था। ऐसा लगता था जैसे राजू श्रीवास्तव उन्हीं की कहानी कह रहे हों।

और उनके जाने की असीम वेदना इसलिए भी है कि वह बड़े-बड़े मंचों पर भी मेरी अपनी बोली ‘अवधी’ में चुटकुले सुनाने में बिल्कुल भी संकोच नहीं करते थे। फिर वह अपने ‘कानपुर’ के तो थे ही।

कॉमेडियन पहले भी हुए हैं और आगे भी होते रहेंगे, लेकिन राजू श्रीवास्तव जैसा खांटी देसी ‘स्टैंड अप कॉमेडियन’ अब शायद ही दोबारा देखने को मिले।

अलविदा गजोधर भैया… 😢😢

– विनय सिंह बैस