
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-
बुद्धिजीवियों का एक वर्ग ऐसा है, जो ‘अवसरवादी’ चरित्र जी रहा है। उसकी ओर समय-समय पर टुकड़े फेंक कर, व्यवस्था-तन्त्र उसे अपने पक्ष में ‘भौं-भौं’ करने के लिए मीडिया के माध्यम से अपना प्रवक्ता और अभिभाषक बनाकर समाज के समक्ष प्रस्तुत करता आ रहा है। वह स्थिति उसी तरह की ही है, जिस तरह से न्यायालय में गवाही देनेवालों को वकील ‘किराये’ पर भी ले लेता है। भाड़े के टट्टू किसी के भी सगे नहीं होते– कुत्तों से भी बदतर स्थिति में दुम हिलाते हुए, ऐसे टुकड़ख़ोर बुद्धिजीवी हर तरह से मौक़े की फ़िराक़ में बने रहते हैं। ‘बुद्धिजीवी’ प्रजाति के ऐसे ‘कुत्ते’ बहुत पढ़े-लिखे-कढ़े होते हैं। ऐसों की किसी के प्रति भी कहीं-कोई निष्ठा नहीं रहती क्योंकि वे मात्र ‘आत्मकेन्द्रित’ रहते हैं। उनकी स्वार्थ की पूर्ति होती रहे :– इसकी जय, उसकी भी जय।