● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
उत्तरप्रदेश के विद्यालयों मे हिन्दी-अध्ययन-अध्यापन की यह तस्वीर सच बोलना जानती है; क्योंकि वहाँ के शासकीय-अशासकीय विद्यालयों मे वर्षभर मे सर्वाधिक अवकाश कर दिये जाते हैं। विद्यालयों मे अधिकतर अध्यापक (महिला-पुरुष) अयोग्य हैं। वह कारण आरक्षण का हो; रिश्वत, पहुँच, प्रभाव, फ़र्ज़ी शैक्षिक प्रमाणपत्रों का रहा हो अथवा अन्य कारण रहा हो।
‘हिन्दी’-विषय कितना आसान है, इसे उत्तरप्रदेश का एक ‘कुकुर’ भी जानता है; लेकिन वह ‘देवनागरी लिपि’ मे सुर-ताल मे भौंक नहीं पाता।
हमारे देश का जाना-माना विद्वान् भी जानता है कि हिन्दी तो उसके लिए ‘हस्तामलक’ है; परन्तु जब वह बोलना और लिखना आरम्भ करता है तब लगता है, वह ‘कितने पानी’ मे है। हिन्दी के पाठ्यक्रम मे ऐसे-ऐसे पद्य हैं, जिनका अर्थ बताते समय विद्यालय के अधिकतर अध्यापकों की भूसी छूटने लगती है। इसके परीक्षण के लिए समूचे उत्तरप्रदेश मे क्रमश: एक मौखिक और लिखित प्रतियोगिताएँ आयोजित की जानी चाहिए। बोलते समय अधिकतर के पैण्ट सरकते नज़र आयेंगे।
हिन्दी-व्याकरण के नाम पर हमारे ९७% प्रतिशत अध्यापक शून्य (०) हैं। ९९ से १००% अध्यापक न तो स्वर का शुद्ध वाचन कर सकते हैं और न ही व्यंजन का वाचन-लेखन कर सकते हैं; शब्दों मे शुद्ध गणना-लेखन करनेवाले शायद कोई अध्यापक हो। ऐसे अध्यापक सन्तोषजनक परिणाम क्या देंगे? इतना ही नहीं, ऐसे भी अध्यापक हैं, जो विद्यालय से निकलने के बाद कोचिंग संस्थानो मे मुँह मारते देखे जा सकते हैं। इतना ही नहीं, ऐसे भी अध्यापक हैं, जो अपने घर पर और घरो मे जाकर भी पढ़ाते हैं। ऐसे मे, सहज प्रश्न है, ऐसी मानसिकता के अध्यापक किसके प्रति स्वामिभक्त हैं? दो-टूक उत्तर है, रुपये के प्रति।
जिस तरह से शासन-प्रशासन की ओर से परीक्षार्थियों को अधिकतम (५०० मे से ५००) अंक देने की व्यवस्था की गयी है, वह निन्दनीय है। गम्भीररहित होकर उत्तरपुस्तिकाओं का परीक्षण और मूल्यांकन अधिकतर वे लोग करते हैं, जो प्रश्नपत्रों में किये गये अधिकतर प्रश्नों के उत्तर स्वयं नहीं लिख सकते।
उत्तरप्रदेश के अधिकतर सांसदों-विधायकों, मन्त्रियों तथा उनके बहू-बेटियों-दामादों, चाचा-भतीजों तथा अन्य रिश्तेदारों ने शिक्षा देने के नाम पर उत्तरप्रदेश मे ‘कुकुरमुत्ते’ की तरह से पाठशालाओं, विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, तकनीकी शिक्षणसंस्थानो के जाल बिछा दिये हैं और ‘ठीकेदारी-प्रथा’ के आधार पर नक़्ल कराने, ‘पेपर-आऊट’ कराने, राजनीतिक दबाव डलवाकर अत्युत्तम-सर्वोत्तम अंक दिलवाने, अयोग्यों-कुपात्रों को ‘टॉप’ करवाने; हाइस्कूल, इण्टरमीडिएट, स्नातक के अंकों को आधार मानकर योग्यता-सूची बनाने की परम्परा उभरी है, उसके आधार पर यदि अयोग्य अध्यापकों की बाढ़ आयी है तो इसके लिए अध्यापकगण, प्रबन्धनतन्त्र, रिश्वत लेकर विद्यालयों को मान्यता देने का नियम तथा माँ-बाप की घृणित स्वार्थ-लोलुपता सीधे तौर पर उत्तरदायी हैं। बताया जाता है कि उत्तरप्रदेश मे भारतीय जनता पार्टी के एक सांसद बृजभूषण सिंह के ५४ शिक्षणस्थान हैं। इसी तरह से समूचे उत्तरप्रदेश मे एक-एक नेता के पास शिक्षा-प्रशिक्षा उपलब्ध कराने के लिए न जाने कितने शिक्षालय होंगे।
इस विकृत शिक्षा और परीक्षाव्यवस्था मे आमूल-चूल बदलाव लाने के लिए एक ‘पारदर्शी प्रकोष्ठ’ का गठन करना होगा, जिसमे एक भी अध्यापक-प्रधानाचार्य, प्रबन्धनतन्त्र तथा राजनीतिक क्षेत्र का व्यक्ति न रहे, बल्कि उस पर गम्भीर शिक्षाविद् और प्रबुद्ध-वर्ग का वर्चस्व रहे, जिसकी अनुशंसा पर विद्यार्थी-उपयोगी परिणाम देने की तीव्र इच्छा उत्तरप्रदेश-शासन की हो।
ऐसा यदि हो जाता है तो शिक्षा के स्तर पर उत्तरप्रदेश को ‘उत्तमप्रदेश’ बनने से कोई रोक नहीं सकता। तो क्या उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ इस पर विचार-मन्थन करने के लिए सहमत हैं?
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २९ जून, २०२३ ईसवी।)