नीलेश सिंह-
जब सारी दुनिया थी सोयी
जाग रहा था तब भी कोई ।
उलझा-उलझा है हर कोई
कौन करे किसकी दिलजोई ।
सबकुछ खो बैठी है शायद
यूँ रहती है खोयी-खोयी ।
कौन यक़ीन करेगा आख़िर
माझी ने ख़ुद नाव डुबोयी ।
हम रोये तो दुनिया चुप थी
मौन हुए तो दुनिया रोयी ।
लोगों ने छलकाए आँसू
हमने अपनी पीर सँजोयी ।
ग़ज़लों के शायर हो तुम तो
बन्द करो ये क़िस्सागोई ।