गज़ल- मैं औरत हूँ तो औरत हूँ

राघवेन्द्र कुमार “राघव”- 

प्रधान संपादक, इण्डियन वॉयस 24

तपिश ज़ज़्बातों की मन में,

न जाने क्यों बढ़ी जाती ?

मैं औरत हूँ तो औरत हूँ,

मग़र अबला कही जाती ।

उजाला घर मे जो करती,

उजालों से ही डरती है ।

वह घर के ही उजालों से,

न जाने क्यों डरी जाती ?

जो नदिया है परम पावन,

बुझाती प्यास तन मन की ।

समन्दर में मग़र प्यासी,

वही नदिया मरी जाती ।

इज़्ज़त है जो घर-घर की,

वही बेइज़्ज़त होती है ।

रिवाज़ों के लबादों से,

वही इज़्ज़त दबी जाती ।

औरत तब भी औरत थी,

औरत अब भी औरत है ।

न जानें क्यों इस दुनियाँ से,

ये दुनियाँदारी नहीं जाती ॥