गौसगंज : विभागीय अधिकारियों की मनमानी से पटरी से उतरी शिक्षा व्यवस्था

कछौना (हरदोई): ब्लाक कछौना में शिक्षा व्यवस्था विभागीय अधिकारियों की खाऊ-कमाऊ नीति के चलते पूरी तरीके से पटरी से उतर चुकी है। जबकि विकासखंड कछौना के परिषदीय विद्यालयों में शिक्षण व्यवस्था को बेहतर करने के लिए इसे जिला अधिकारी ने गोद ले रखा है। प्रशासन के लाख प्रयास के बाद भी बच्चों का रुझान सरकारी स्कूलों की तरफ नहीं जा रहा है। जबकि शासन द्वारा परिषदीय विद्यालयों कों सुधारने के लिए करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाया जा रहा है।

शनिवार को मीडिया टीम को परिषदीय विद्यालय गौसगंज में नामांकित 167 बच्चों के सापेक्ष मौके पर 84 बच्चे मौजूद मिले। विद्यालय में बिजली की वायरिंग अस्त-व्यस्त थी जबकि यह विद्यालय विधानसभा चुनाव के दौरान पोलिंग बूथ बनाया गया था जिस हेतु विद्युत वायरिंग की धनराशि भी निर्गत की गई थी। विद्यालय के 2 कक्षों में प्लास्टर व फर्श उखड़ी है। वहीं खिड़कियों के पल्ले भी टूटे हैं। विद्यालय के मुख्य गेट पर व विद्यालय प्रांगण में कूड़े के ढेर लगे हुए हैं जिससे हमेशा गंदगी का अंबार लगा रहता हैं।

इस संदर्भ में ग्राम प्रधान मंजू सिंह ने बताया कि हमारे ग्राम सभा की 20000 आबादी होने के बावजूद आज तक प्रशासन द्वारा कोई भी सफाई कर्मी नियुक्त नहीं किया गया है जिसके चलते हर तरफ गंदगी का अंबार है। विद्यालय में मिड-डे-मील भी चूल्हे द्वारा बनाया जा रहा है। विद्यालय में कार्यरत रसोइयों ने बहुत दुखी मन से बताया कि हम लोगों को 8 माह का समय गुजर जाने के बाद भी मानदेय नहीं दिया गया है जिससे इनका होली का त्यौहार फीका रहा है। इतना ही नही विद्यालय प्रांगण में एक इंडिया मार्का नल भी खराब पड़ा हुआ है।

इसके बाद टीम प्राथमिक विद्यालय धुरपुरा पहुंची। जहां पर मात्र 34 बच्चे उपस्थित मिले। विद्यालय के मुख्य गेट के पास स्थिति भूमि पर गांव के एक ग्रामीण द्वारा अवैध कब्जा किया गया है। वहीं बच्चों द्वारा जानकारी मिली कि इंचार्ज अध्यापक ने अपनी जगह गांव का एक प्राइवेट व्यक्ति नियुक्त कर रखा है जिसके द्वारा शिक्षण व्यवस्था का कार्य कराया जा रहा है। इसके चलते इंचार्ज अध्यापक विद्यालय में मनमाने तरीके से आते व जाते हैं। विभागीय अधिकारियों के रहमों करम से यह मामला लगातार एक वर्ष चल रहा है। विद्यालय परिसर में लगे इंडिया मार्का नल में फर्श नदारद थी। वहीं चट्टान के न होने के कारण बच्चों ने उसमें गिरने की शिकायत की। आखिर गरीब परिवारों के बच्चे इन विद्यालयों में शिक्षण कार्य करने जाते हैं। गरीबों के नाम पर राजनीति करने वाले जनप्रतिनिधि भी गरीबों को बेहतर शिक्षण व्यवस्था मुहैया कराने की दिशाा मेंं कुुछ न कर सके। जब विद्यालय में उचित प्रवेश नहीं है।


गंदगी व मूलभूत संसाधनों का अभाव


शिक्षकों की शिक्षण कार्य में रुचि व सरकारी योजनाओं में जमकर कमीशनखोरी के चलते विद्यालय (विद्या के मंदिर) मात्र शिक्षा के नाम पर परिपाटी निभा रहे हैं। ऐसे में नौनिहालों का भविष्य कैसे उज्ज्वल होगा? जिलाधिकारी महोदय जी, क्या आप इन विद्यालयों की जमीनी हकीकत से रूबरू हो पाएंगे? ऐसे में जिलाधिकारी द्वारा दिया गया स्लोगन “पढ़ेगा-बढ़ेगा कछौना” कैसे सार्थक होगा?


रिपोर्ट- पी०डी० गुप्ता