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आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का संदेश

जो भी जन यह मानते हैं कि तपस्या करने के लिए किसी ‘उपत्यका’ (पहाड़ के समीप का भूभाग/भू-भाग/भू का भाग– षष्ठी तत्पुरुष समास; सम्बन्ध कारक) अथवा ‘अधित्यका’ (पहाड़ के ऊपर का समतल भूभाग) की आवश्यकता पड़ती है, वे परम्परागत ‘जनश्रुति- (लोग-द्वारा जाना/सुना गया, किंवदन्ती)-अनुश्रुति (श्रुतिपरम्परा से प्राप्त कथा/ज्ञान) के माध्यम से ज्ञात तथ्यों पर अचिन्त्य (ऐसा कर्म, जो चिन्तन से परे हो।) रहकर विश्वास कर लेते हैं, जबकि सत्य इससे परे है। पहले का भू-भाग प्रकृति-प्रधान होता था। पर्वत, पहाड़, लता-पादप, नद-नदी, सागर, मुक्त प्रांगण आदिक का विस्तार था। पग-पग पर प्रकृति-दर्शन होता रहता था। हमारे पूर्वज सृष्टि के अन्तर्गत सम्मिलित प्रत्येक उपादान को जीवन्त मानते थे, तब ‘मूक’ का विग्रह ‘वाचाल’ लक्षित होता था; हमारे पूर्वज उनके साथ संवाद करके विवाद का नियमन कर-करा लेते थे।

स्वार्थ-परमार्थ के लिए ‘निभृत निलय’ (एकान्त स्थान) में रहकर जो साधना की जाती थी, वही ‘तपस्या’ कहलायी, जिसके मूल में ‘हठधर्मिता’ का प्राचुर्य बना रहा।

साधना भी एक प्रकार का ‘हठयोग’ है, जो नकारात्मक प्रवृत्ति का द्योतक (सूचक) है और सकारात्मक प्रवृत्ति का भी। मनुष्य जब स्वयं के आधिपत्य (प्रभुत्व) के लिए अपने विषय को साधने के लिए अपने अनुष्ठान में आरब्ध (प्रवृत्त; आरम्भ) हो जाता है तब वह ‘नकारात्मक’ संदर्भ को रेखांकित करता है और जब वही ‘परमार्थ-हित के साथ (यहाँ ‘से’ अशुद्ध है।) सम्पृक्त (संयुक्त) होता है तब वह ‘सकारात्मक परिवेश’ का सर्जन और संवर्द्धन करता लक्षित होता है।

हमें परमार्थ-चिन्तन और प्रयोग के प्रति उन्मुख रहना होगा।
आइए! उपर्युक्त स्वस्थ चिन्तनकोण के साथ स्वयं को सम्बद्ध करें।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ सितम्बर, २०२१ ईसवी।)