मै पत्रकार नही हूँ !

प्रभात सिंह (मान्यता प्राप्त पत्रकार, लखनऊ )


मैं ये स्वीकार करता हूँ कि मैं पत्रकार नही हूँ। मैं अपना दो- पहिया वाहन चलाते वक्त हेलमेट पहनता हूँ, गाड़ी के कागज़ पूरे रखता हूँ, मैं किसी थानेदार, किसी विधायक, किसी मंत्री को व्यक्तिगत तौर पर नही जानता, और न ही अपनी दम पर किसी प्रकार के व्यक्तिगत या किसी को उपकृत करने के लिए कोई कार्य करने की सामर्थ्य रखता हूँ। मैं अपने या किसी अन्य संस्थान के लिए कोई विज्ञापन की व्यवस्था नही करवा सकता। या किसी खबर के बदले किसी लाभ की आकांक्षा रख सकता हूँ। मैं पत्रकार बिल्कुल नही हो सकता, क्यो कि मैंने पत्रकार होने की पढ़ाई नही की है।

मैं ग्रामीण अंचलों में पेड़ों के कटान, राशन की दुकान, थानों पर फरियादियों की कतार, प्रधान की निधि, जनपद मुख्यालय के कलेक्ट्रेट, अस्पताल, एस पी ऑफिस समेत तमाम सरकारीतंत्रों एवं जनप्रतिनिधियों से लेकर राजधानी स्थित सचिवालय, सूचना विभाग के गलियारों में घूमती खबरों को महसूस कर सकता हूँ; पर लिख नही पाता। मैं लिखता नही खबरें अब, क्योकि अखबारी कागज़ को मेरा लिखना पसंद नही।

जब तक मैं जीवित रहा, मैं रोज मरना महसूस करता रहा। मैं मार दिया गया कुछ वर्षों पहले । जब राजधानी लखनऊ के प्रेस क्लब में पत्रकारिता का नरसंहार हुआ था। जब एक बड़े रसूखदार नेता, उद्योगपति, बैंकर, समाजसेवी, खेलप्रेमी के खिलाफ उन्हीं का पूर्वकर्मचारी सबूत लिए प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से अपनी बात कह रहा था। अखबारों , चैनलों के छायाकारों, कथित पत्रकारों, वकीलों ने सरेआम उसकी आवाज़ बंद कर दी, बत्तियां बुझा दी गईं, उसे खदेड़ दिया गया बाहर। मैं उसकी आवाज़ की तलवार लिए निकल चुका था युद्ध में। मैं लड़ा कई दिन तक अकेला। एक शाम अगले दिन के मोर्चे की तैयारी के वक़्त मुझे अपने ही खेमे में घेर लिया गया, ताकतवर सेना के सामने जीत का सपना देख रहे मेरे सर को कलम कर दिया गया। हाथ छोड़ दिये गए लिखने के लिए। वही लिखने के लिए जो अब पत्रकार लिखता है। मैं पत्रकार नही हूँ। नही बन पाया मैं पत्रकार। मुझे अफसोस भी नही है।

—-रिपोस्ट 30 मई 2017 की पोस्ट