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हाल-ए-पत्रकारिता : असहायों का नहीं कोई मददगार

सुधीर अवस्थी परदेसी –

पत्रकार को समाज के लोग समर्थ मानते हैं । किसी भी अधिकारी से बात करनी हो या मुलाकात बेझिझक पत्रकार बात भी कर लेता है। पत्रकार का परिचय देकर मुलाकात करने में भी कोई खास दिक्कत नहीं होती है। इसलिए लोगों की धारणा है कि पत्रकार समर्थ होता है। उसकी यह धारणा तब तक सच साबित होती है जब तक उसके साथ में एक नामी-गिरामी संस्थान की छत्रछाया और काम करने वाली उम्र उसका साथ देती है। जब इन दोनों से वह अलग हो जाता है तो समर्थ की असमर्थता देख कर लोग तरह-तरह की बातें करते हुए उसके मनोबल को गिराते हैं। वह अपनी गुजरी उम्र के साथ वर्तमान दौर का जब मूल्यांकन करता है तो स्वयं में काफी टूट जाता है। ऐसे में उसको बहुत कम ही लोग नजर आते हैं।

बीते समय में ग्रामीण पत्रकारिता हो या शहरी बहुत कुछ निष्पक्ष पत्रकारों ने खोया है । अब उनके पास कुछ नाम सहित खबरें और चंद लोगों में वाहवाही के सिवा उनकी कोई धरोहर नहीं नजर आती। यह बात अलग है कि उनकी तपस्या का फल उनकी संतानों में अक्सर देखा जाता है जोकि पिता जिनका सही से लालन-पालन भी न कर पाया हो उनकी संताने अपने पिता का पालन पोषण उम्र से पहले ही शुरू कर दिया करती हैं । यही मात्र उनके जीवन यापन का सहारा बन जाया करता है। समाज के लिए शासन-प्रशासन की खबरें लिखते – लिखते जिन्दगी की शाम हो गई। उजाला करने के लिए अब कोई नजर नहीं आता।

पत्रकार से हर विभाग नाराजगी मानता है। यहां तक कि जहां का पत्रकार निवासी होता है उसके गांव और मोहल्ले के लोग भी नाराजगी मानते हैं। कभी न कभी ऐसा जरूर हो जाया करता है की कोई घटना घटी आस-पड़ोसियों के मन में रहता है कि उस खबर को छुपा लिया जाए। गांव घर के किसी ने शासन प्रशासन तक वह जानकारी पहुंचा दी जिसको लोग छुपाना चाहते थे। तो पत्रकार पर ही दोषारोपण हो जाया करता है।

घर में माता पिता यही कहते कि सुबह से चले गए शाम को लौटे । जब कोई कार्यक्रम हुआ कहीं कोई खर्चे की बारी आई तो घर में ही गिड़गिड़ा रहे हैं । पत्नी कहती कि शादी के बाद आज तक न कहीं घुमाने ले गए न कोई इच्छा पूरी की । बस ऐसे ही जिंदगी गुजर रही है । बड़े होकर बच्चे कहते हैं कौन से तुमने अच्छी शिक्षा दी क्या तुमने हमारे साथ किया। सुबह से लेकर शाम तक घूमते रहे । अब बता रहे हैं कि हम कंपटीशन में टॉप नहीं है । बहन भाई भी आरोप लगाते हैं कि मेरे साथ तुमने किया ही क्या है सिर्फ समाज सेवा की है। अब जाओ समाज सेवा करो जाकर ! ऐसे में चौथे पन की दहलीज पर बैठा एक पत्रकार पुरानी यादें कर विचलित होता है। ईश्वर की याद कर अपने आप को उन्हें समर्पित कर जीवन की बची सांसो को किसी तरह जीता है।

ऐ समाज के लोगों! आपकी भी अहम जिम्मेदारी है। जिस सजग प्रहरी ने आपका ध्यान रखा है। आपके लिए खबर लिखी है। आपका नाम रोशन किया है। आपको नेता बनाया है। आपको अधिकारी बनाने में उसकी भूमिका है। तो यह आप लोगों की भी जिम्मेदारी है । कोई पत्रकार अगर इस स्थिति में है तो उसका सहयोग कर अपने ऋण को अदा कर पत्रकार का सहयोग करें। वैसे पत्रकारों में भी गुरु शिष्य के रिश्ते होते हैं। लेकिन बहुत से शिष्य इस कदर आगे चले जाते हैं कि गुरुदेव को पलट कर देखते भी नहीं । मित्रता का बड़ा दायरा आपस पत्रकारों में होता है। वह अक्सर कर एक दूसरे को नीचा दिखाने में बड़ी दिलचस्पी रखते हैं। ऐसे में पत्रकार से पत्रकार का सहयोग काफी मुश्किल है। स्वभाविक है जब दोनों की दशा एक ही है तो कौन क्या करे ? निष्पक्ष पत्रकार वास्तव में मां सरस्वती के साधक होते हैं। संपन्न लोगों को उनका समय समय पर सहयोग अवश्य करना चाहिए। यह उनका कर्तव्य और धर्म है। जिससे कि नि:स्वार्थ पत्रकारिता को बढ़ावा मिले।

लेखक – यू०पी०के हरदोई जिले में ग्रामीण पत्रकार हैं।