‘लॉक-अप्’ मे लोकतन्त्र के चतुर्थ स्तम्भ का चीरहरण!..?

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

यह घटना पिछले २ अप्रैल की है। सीधी के भारतीय जनता पार्टी के विधायक केदारनाथ सिंह और उनके बेटे के विरुद्ध ‘नाट्य समिति’ के संचालक नीरज कुन्देर पर अभद्र भाषा-व्यवहार का आरोप मढ़ते हुए, उसे विभिन्न आपराधिक धाराओं मे सीधी-कोतवाली थाने मे धारा १५१ के अन्तर्गत गिरिफ़्तार कर, कारागार भेज दिया गया था। उस आरोपित के समर्थन मे पत्रकार और रंगकर्मी भी आ गये और सीधी-पुलिस के विरुद्ध धरना-प्रदर्शन करने लगे, परिणामस्वरूप उनमे से कुछ को गिरिफ़्तार कर लिया गया ओर कुछ भाग खड़े हुए। पुलिस ने जिन्हें बन्दी बना लिया था, उनके कपड़े बलपूर्वक उतरवा लिये गये, केवल ‘चड्ढी’ पहनने की अनुमति दी गयी थी। बेशक, सम्बन्धित पुलिसकर्मियों का वश चलता तो वे चड्ढी भी उतरवाकर उन सभी आरोपितों को ‘दिगम्बर’ बना देते।

कथित पुलिस पर आरोप है कि उपर्युक्त विधायक के इशारे पर आरोपितों को सीधी-पुलिस ने यातना दी है।

सम्बन्धित पुलिस-अधिकारी से जब पूछा गया– इनके कपड़े क्यों उतारे गये? इस पर उस बेहूदे पुलिस-अधिकारी ने कहा– हमे डर था कि वे आरोपित अपने कपड़ों से कहीं फाँसी न लगा लें, इसलिए हमने उनके कपड़े उतरवा लिये। वह पुलिस-अधिकारी कितना ‘चतुर-मूर्ख है, इस पर विचार करते रहिए।

प्रश्न है, ‘भारतीय दण्ड संहिता’ की किस धारा मे आरोपितों के कपड़े उतरवाकर ‘चड्ढी’ मे रखने का प्रविधान है?

यह पूर्णत: मानवाधिकार का उल्लंघन है, जिसका स्वत: बोध/संज्ञान करते हुए, मध्यप्रदेश मानवाधिकार- आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति नरेन्द्रकुमार जैन ने पुलिस- महानिदेशक और पुलिस महानिरीक्षक, रीवा (म० प्र०) से एक सप्ताह के भीतर स्पष्टीकरण करने के लिए आदेश जारी कर दिया है।

इस पर जिस स्तर की प्रतिक्रिया ‘मीडिया-जगत्’ की ओर से की जानी चाहिए, वह दिख नहीं रही है, जो कि शुभ-संकेत नहीं है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ९ अप्रैल, २०२२ ईसवी।)