——०चिन्तन की एक कड़ी०——
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
वस्तुत: 'काव्य' और 'अनुभूति 'अन्योन्याश्रित हैँ; एक-दूसरे के पूरक हैँ; सहोदर न होते हुए भी, 'सहोदर' से प्रतीत होते हैँ। जब भाव अनुभूति के गह्वर मे पैठता है तब सर्जन-विश्व से ('सृजन' अशुद्ध है।) साक्षात्कार करता है। वैसी स्थिति मे उसकी सर्जनशीलता संवेदना के प्रति आग्रहशील संलक्षित होती है, जो शिल्पस्तर पर समृद्ध रहती है। उसकी सर्जनात्मकता मे बिम्ब-विधान और प्रतीक-योजना का सौन्दर्यबोध मन्त्रमुग्ध कर देता है; क्योँकि कव्यानुभूति का जो विश्व है, उसमे बिम्बोँ और प्रतीकोँ का अद्भुत विधान है। उसकी अनुभूति और संवेदना 'एकात्म' हो जाती है। उसका कथ्य प्रारम्भ मे एक छोटी-सी अनुभूति पर आधारित दिखता है; किन्तु निष्पत्ति/निष्कर्ष/उपसंहार तक पहुँचते-पहुँचते, उसका विस्तार क्षितिजव्यापी हो जाता है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो सर्जनधर्मी अन्तर्मन तृप्ति और संतोष से परिपूर्ण हो रहा है, जिसके प्रत्यक्षीकरण का अर्थ है– प्रसन्नता; परिचय का अर्थ है– संस्मरण तथा सामीप्य का अर्थ है– संतुष्टि और तृप्ति।
कई सहस्र वर्ष से देश के मनीषियोँ ने जो कुछ चिन्तन-मनन-मन्थन किया था, उन सबकी गूढ़ सांस्कृतिक अनुभूति से काव्य का शिष्ट हृदय आर्द्र बना हुआ है। काव्य की साधना मे कठोर होते हुए भी, सांस्कृतिक प्रवृत्तियोँ मे कुसुम-सी सुकोमलता है, जिसके चिन्तन के विषय सर्वतोमुखी हैँ। अनुभूति, कल्पना तथा विचार– उसके व्यक्तित्व के दर्पण मे प्रतिबिम्बित होकर ही प्रकट होते हैँ।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १० जुलाई, २०२५ ईसवी।)