● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
रुपये फेँके जा रहे हैँ; बहुसंख्यजन अपनी आजीविकावृत्ति (पेंशन) के रुपये कुकुरमुत्ते-से उगे प्रकाशकोँ की जेब मे डालते आ रहे हैँ और पाण्डुलिपियाँ ‘पुस्तक’ के रूप मे सार्वजनिक होती आ रही हैँ। अधिकतर लोग, जिनके पास शब्दसम्पदा नहीँ, ‘दर्ज़नो’ पुस्तकोँ की लेखिका-लेखक बना दिये जा रहे हैँ। प्रश्न है, उन पुस्तकोँ को क्रय करके पढ़ता कौन है? प्रश्न अब भी अपने स्थान पर तनकर खड़ा है। ९५ प्रतिशत पुस्तकेँ नवजात के रूप मे दिखती हैँ और सुब्ह होने से पहले ही कालकवलित हो जाती हैँ।
देश मे जो ‘बड़े’ प्रकाशक की पदवी पा चुके हैँ, वे भी धनराशि लेकर पाण्डुलिपि-प्रकाशन करने मे जुट गये हैँ। उन्हेँ भी न तो योग्यता की चिन्ता है और न ही वैशिष्ट्य की, तिज़ोरी भरते रहो-कारख़ाने से पुस्तकेँ निकालते रहो। हैरानी तब और होती है जब ₹८० की लागतवाली पुस्तक का मूल्य ₹५०० निर्धारित किये जाते हैँ; क्योँकि बाज़ार का चरित्र कहता है– पुस्तकेँ बिकती नहीँ, ‘बेची’ जाती हैँ। ‘कमीशन’ ७० प्रतिशत फेँको और पुस्तकेँ बेचो। बहुसंख्य लेखक पाण्डुलिपियोँ का स्वयं टंकण कराकर अग्रिम धनराशि के साथ प्रकाशकोँ को इस शैली मे सिपुर्द (‘सुपुर्द’ अशुद्ध है।) कर देते हैँ, ,”अब तुम्हारे हवाले वतन साथियोँ!”
ऐसे भी प्रकाशक पैदा हो गये हैँ, जो गुणरहित ‘असुन्दरी-सुन्दरी’ को रातोँरात ‘महान् महिला उपन्यासकार, कहानीकार, कवयित्री और जाने क्या-क्या बना देते हैँ। बाज़ार मे कुछ भी असम्भव नहीँ; ‘समझौता’ करने की कला आनी चाहिए; चक्कू फल पर गिरे वा फल चक्कू पर गिरे, हिसाब बराबर रहता है; बस फल का स्वाद मिलते रहना चाहिए। हमने अतीत मे महत्त्वाकांक्षा से भरपूर अयोग्यतारहित ऐसे कई चेहरे देखे थे और अब भी देखते आ रहे हैँ।
आइ० ए० एस०-पी० सी० एस०-अधिकारी, प्राध्यापक, सहायक प्राध्यापक आदिक लोग भी अपने तरीक़े से जुगाड़ करते हैँ और प्रकाशक भी ‘लुब्धक’ का चरित्र जीते हुए, अपनी आँखेँ पूरब-पच्छिम, उत्तर-दक्खिन नचाते हुए, मूल ‘मस्तिष्क-क्रीड़ा’ (माइण्ड गेम) करते हुए, ‘लक्ष्मी’ पर केन्द्रित रहता है। उसे ‘सरस्वती’ से कोई सरोकार नहीँ, ‘धन्धा’ चलता रहे, उसका यही अभिधेयार्थ रहता है।
जब कभी हमारे मन को उपर्युक्त धारा-संग बहने का भाव स्पर्श करता है तब अपने सामने जीवनमूल्य और संतति के चेहरे होते हैँ। वैचारिक स्थिति सुदृढ़ हो उठती है– जो धनराशि किसी वणिकवृत्तिवाले प्रकाशक को दी जायेगी, उससे संतति के लिए उत्तम कोटि की खाद्यवस्तु और परिधान का क्रय किया जा सकता है; तत्काल वह भाव तिरोहित हो जाता है।
वास्तव मे, यह एक प्रकार का ‘सारस्वत प्रदूषण’ है।
(आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ८ जुलाई, २०२५ ईसवी।)