मज़दूरों को एक गिलास ठंडे पानी के लायक भी नहीं समझने वाले इनके हक़ की बात करते हैं

राघवेन्द्र कुमार त्रिपाठी ‘राघव’-

समाजवाद रो रहा है । मानवाधिकार मिट गये । ऊपर वाले तेरी कायनात बंट गयी । हमारे लिए संस्कृति की दीवार बनाने वाला वह कर्म का पुजारी आज दुर्दिनों में है । आज नंगा, भूखा, बिना घर के ये मानवता की असली तस्वीर दिखा रहा है । जो अपने को गला कर खेतो में अनाज उगाता है । तपती धूप में हमारा घर बनाता है । कारखानों में पिसता है । अरे ! छोटे बड़े सारे काम तो यही करता है । पर हाय री किस्मत ! अन्नदाता भूखा सोता है । उसे एक गिलास ठंडे पानी के लायक भी नहीं समझने वाले मज़दूरों के हक़ की बात करते हैं । ये तो सच्चे अर्थ में धरती के देवता हैं और ईश्वर रूप हैं । ईश्वर तो प्रेम का भूखा है और थोड़ा पाकर भी तृप्त हो जायेगा और समझ लेगा कि अभी पृथ्वी पर उसके अवशेष में मानव शेष है ।

श्रमिकों के लिए कई सरकारी योजनाएं हैं और कई योजनाएं कतार में हैं । किन्तु विचार करने योग्य है कि क्या इन योजनाओं में से कोई योजना ऐसी है जो श्रमिकों को उन्नति की ओर ले जाती दिखायी देती है । श्रमिक वर्ग के बच्चों में कुपोषण की समस्या प्रायः देखने में आती है । श्रमिक वर्ग के बच्चे प्राइवेट शैक्षिक संस्थानों को केवल दूर से ही देख सकते हैं । क्या कभी ऐसी स्थिति बनेगी कि देश के प्रतिष्ठित विद्यालयों में मज़दूरों के बच्चे भी शिक्षा प्राप्त कर सकें ? सरकारी नौकरियों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के वेतन के सापेक्ष मानदेय या सहायता राशि जब तक श्रमिकों को नहीं मिलती मज़दूर दिवस मनाने या न मनाने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता