साम्प्रदायिक उन्माद के लिए ‘राजनेता’ ही उत्तरदायी

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

बंगाल मे साम्प्रदायिक उन्माद के मूल मे सत्ता की राजनीति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। निकट भविष्य मे ‘हनुमान्-जयन्ती’ के अवसर पर किसी को भी जुलूस निकालने की अनुमति न दी जाये। इतना ही नहीं, ‘ताजिया’ आदिक को भी सड़क पर निकालने की इज़ाज़त न दी जाये। यदि कोई अनुमति की अवहेलना करे तो उसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम’ के अन्तर्गत गिरिफ़्तार कर, कारागार मे डाल दिया जाये। यदि कोई भी उस दिन हिंसक-विध्वंसक कृत्य करता हो; कराता हो तो उसे सीधे ‘गोली’ मारने का वैधानिक आदेश सार्वजनिक कर दिया जाये। इतना ही नहीं, किसी भी राजनैतिक दल का कोई भी नेता यदि ‘भड़काऊ’ भाषण करता हो तो उसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम’ के अन्तर्गत बन्दी बनाकर उसपर मुक़द्दमा किया जाये।

जब तक बंगाल की सरकार पारदर्शिता के साथ अपनी भूमिका का निर्वहण नहीं करती, उससे भी प्रश्न किये जाते रहेंगे; क्योंकि वहाँ की उन्मादी स्थिति के कारण के मूल मे बंगाल-सरकार का गुप्तचर-तन्त्र भी है। जिस सम्प्रदाय के लोग दंगा कराने के लिए ‘घिनौने’ उपक्रम करते रहे; योजनाएँ बनाते रहे, उससे बंगाल- सरकार के मुख़बिर वाक़िफ़ तक न हो सके, यह शर्मनाक स्थिति है।

यहाँ यह भी उल्लेख्य प्रश्न है― केन्द्र-शासन की ओर से बंगाल मे ‘अर्द्ध सैन्य बल’ भेजने का उद्देश्य क्या है? यह प्रश्न इसलिए कि गृहमन्त्रालय की ओर से भेजा गया कथित बल ‘बलहीन’ बना रहा और उसकी आँखों के सामने साम्प्रदायिक दंगे लगातार होते रहे; रेल स्टेशन पर धावा बोला जाता रहा और वह मूकदर्शक बना रहा। ऐसे मे, हम इस प्रश्न से इन्कार भी नहीं कर सकते― ऐसा तो नहीं, अर्द्ध सैन्य बल को किसी गर्हित ‘राजनीतिक हित’ के पोषण के लिए भेजा गया हो?

बहरहाल, देश मे वर्ष २०२४ के चुनाव के संदर्भ मे ये सभी घृणित समीकरण बैठाये जा रहे हैं, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। ऐसे मे, देश के मतदाताओं को समस्त घटनाओं को गम्भीरता के साथ समझना होगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ अप्रैल, २०२३ ईसवी।)