● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
देश के वे सभी मीडियाकर्मी, जिन्हें रामनवमी की शोभायात्रा निकालते समय उत्तरप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, गुजरात तथा महाराष्ट्र मे सुनियोजित ढंग से कराये गये दंगे नहीं दिखे; निहायत घटिया क़िस्म के राजनेताओं के भड़काऊ भाषण नहीं सुनायी दिये; भक्तों की अपार भीड़ के चलते, मन्दिर के एक हिस्सा के धँसक जाने से ३६ लोग की मौत नहीं दिखी; कारनामे दिखाने के चक्कर मे ३ अतिवादियों की करण्ट लगने से समाप्त होती जीवनलीला नहीं दिखी; मसाजिद (‘मस्जिद’ का बहुवचन) मे घुसकर भगवा झण्डा और हथियार लहराते हाथ नहीं दिखे, चुल्लूभर पानी मे डूब मरो।
बिना ‘लिखित’ अनुमति लिये ड्रम बाजा और हथियारों के साथ जुलूस निकालने ही क्यों दिया गया था? यदि शोभायात्रा निकालनी ही थी तो सद्भावना के वातावरण मे बिना कानफाड़ू ड्रम बजवाये, नारेबाज़ी किये तथा हथियार लिये निकालते और वह भी प्रशासन से ली गयी ‘लिखित’ अनुमति के साथ। ‘रामधुन’ के साथ यदि शालीनता के साथ शोभायात्रा संवेदनशील क्षेत्रों मे भी निकाली गयी रहती तो दूसरे समुदाय के लोग उस सुमधुर संगीत से प्रभावित होकर, ‘प्रेमवश’ (भयवश नहीं) ‘पुष्पवर्षा’ कर, साम्प्रदायिक सौहार्द (‘सौहार्द्र’ अशुद्ध है।) के परिवेश की रचना कर रहे होते।
एक समुदाय दूजे समुदाय के सीने पर चढ़कर नंगा नाच करेगा; समुदाय-विशेष का नाम लेकर मा-बहन को गालियाँ देगा; अपनी गतिविधियों से उत्तेजित करेगा तो दूसरा समुदाय आख़िर कब तक सब्र करेगा? ऐसा इसलिए कि वहाँ अतिवादियों की सरकार है।
किसी अन्य जगह घरों मे घुस-घुसकर उन लोग और उनके परिवार के लोग को मारा गया; उनका घर जलाया गया, जो घृणित प्रकार के जुलूस मे शामिल होकर दूसरे समुदाय को अपने गन्दी हरकतों से उकसा रहे थे। वहीं गेहूँ के साथ घुन भी पिसते दिख रहे थे; क्योंकि वहाँ दूसरे समुदाय का समर्थन करनेवाली सरकार है।
यदि धर्म और मज़्हब के नाम पर ‘नंगा नाच’ करना ही हो; एक-दूसरे को ललकारना ही हो तो एक बार दोनो समुदाय के हिंस्र और कट्टर लोग हर स्तर पर आमने-सामने आकर शक्ति-प्रदर्शन कर लो, ताकि यह भ्रम मिट जाये― मै महागुण्डा कि तू महागुण्डा। इससे कुछ समाजघाती प्रजातियों की संख्या भी घट आयेगी। यह बार-बार की नौटंकी से हम परेशान हो गये हैं; ऊब गये हैं।
सबसे अच्छा उपाय है, इस देश मे दिख रहे सभी मन्दिर, मस्जिद तथा अन्य पूजास्थलों को विध्वस्त कर दिया जाये और किसी को भी ‘धर्म’ और ‘मज़्हब’ के नाम पर सड़क पर ‘नंगा नाच’ करते ही ‘गोली’ मार दी जाये; क्योंकि उन भँड़ुओं के विरुद्ध कठोरतम काररवाई करने का समय आ चुका है। जो भी राजनेता ‘धर्म’ और ‘मज़्हब’ के नाम पर भीड़ को भड़काता दिखे, उसे तत्काल ‘गोली’ मारी जाये; क्योंकि दंगा-फ़साद की जड़ मे यही नेता रहते हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २ अप्रैल, २०२३ ईसवी।)