एक वैचारिक श्रद्धांजलि-–
मेरे स्मृतिपटल पर नब्वे (‘नब्बे’ अशुद्ध है।) के दशक का मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का रायपुर-अधिवेशन अंकित हो चुका है, जब अमृता प्रीतम, कृष्णा सोबती, मन्नू भण्डारी तथा महाश्वेता देवी के साथ विस्तारपूर्वक ‘कथाशिल्प के लिए भाषा का महत्त्व’ विषय पर संवाद करने का सुअवसर प्राप्त हुआ था। उस संलाप की अवधि में मन्नू भण्डारी का दृष्टिबोध पुरुष-जाति के प्रति अपेक्षाकृत अधिक शुष्क जान पड़ रहा था और रुक्ष भी। वे कथोपकथन के स्तर पर प्रत्यक्षत: पुरुष-गतिविधियों के विरुद्ध लक्षित हो रही थीं। उन्होंने जब अपने संवाद के दौरान ‘स्त्री-विमर्श’ का विषय प्रस्तुत किया था तब मैंने उनसे प्रश्न किया था, “आदरणीया! आज ‘स्त्री-विमर्श’ का औचित्य क्या है? संसार में दो ही जातियाँ हैं :– स्त्री और पुरुष; और ये दोनों ही ‘अर्द्ध-नारीश्वर’ के रूप में प्रतिष्ठित हैं। ऐसे में, आप मात्र ‘स्त्री’ की प्रतिष्ठा कर ‘पुरुष-सोच’ को ही अनुचित ठहराने का प्रयास करती आ रही हैं।” इस पर मन्नू भण्डारी कुछ आक्रोशमय मुद्रा में बोलीं, “आपको मालूम नहीं, जाति किसे कहते हैं?” फिर मेरा प्रश्न था, आप-जैसी साहित्यकार को यह नहीं ज्ञात कि स्त्री-पुरुष का एक-दूसरे के अभाव में उनकी पूर्णता ही नहीं है। इस पर उनका कहना था, “आपको नहीं मालूम, महिलाएँ पुरुष के बिना भी रह रही हैं? पुरुष उनका ‘यूज़’ करता है; ‘मिसयूज़’ करता है।”
मैं स्वयं को रोक न सका और बोल पड़ा, “और महिलाएँ किसको ‘यूज़’ और ‘मिसयूज़’ करती हैं; महोदया! इन पर कौन प्रकाश डालेगा?” मन्नू भण्डारी आँखें तरेरती रहीं। यही कारण है कि उन्हें ‘पुरुषवादी सोच के विरुद्ध’ चिन्तन करनेवाली कथाकार भी कहा गया है।
उपर्युक्त विषय से परे होकर विचार किया जाये तो वे एक संवेदनशील और समयसत्य कथाकार थीं; भली महिला थीं तथा कथाशिल्प की समृद्धि की दृष्टि से अपने समय की प्रथम पंक्ति की कृति कृतिकार रहीं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १५ नवम्बर, २०२१ ईसवी।)