चुनावी चिट्ठी – कैसे माने कि देश में अराजकता है ?

राम वशिष्ठ स्वतंत्र लेखक व फिल्मकार-

साहिबान,
आज की चिट्ठी में चुनाव के एक ऐसे मुद्दे पर बात करते हैं जो बड़ा अजीबोगरीब है । अजीबोगरीब इसलिए कि चुनाव के दौर में प्रत्याशी एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप तो लगाते हैं और उनके समर्थक भी सिर्फ उनको वोट देने की अपील करते है लेकिन एक ग्रुप बन जाए और वो सिर्फ इसलिए किसी पार्टी के खिलाफ वोट करने को कहें क्योंकि उसकी विचारधारा उनसे अलग है ।

पहले 200 साहित्यकार जिनमें नयनतारा सहगल , अरूंधती रॉय जैसे नाम शामिल हैं और फिर 100 से अधिक फिल्मकार जिनमें आनन्द पटवर्धन , दीपा धनराज , देवाशीष मखीजा , सनल कुमार शशिधरन शामिल हैं , अपील जारी करके कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी को वोट नहीं दिया जाए । वो मोदी को तानाशाह कहकर फासीवाद को हराने की अपील करते हैं और अब 616 फिल्म और थियेटर आर्टिस्ट भाजपा को वोट नहीं देने की अपील कर रहे हैं । दरअसल इन 616 लोगों ने 12 भाषाओं में एक पत्र लिखकर उसे आर्टिस्ट यूनाइट इंडिया की वेबसाइट पर ड़ाला हैं । पत्र में अमोल पालेकर , नसीरूद्दीन शाह , नसीरूद्दीन शाह की पत्नी रत्ना पाठक शाह , अनुराग कश्यप , कोंकणा सेन शर्मा , गिरीश कर्नाड , उषा गांगुली , अभिषेक मजूमदार , मीता वशिष्ठ , मकरंद देशपांडे और अरूंधती नाग आदि के हस्ताक्षर हैं । पत्र में आगामी लोकसभा चुनाव को इतिहास के सबसे गंभीर चुनाव लिखा है और लिखा है कि आज गीत , नृत्य , हास्य सहित कला खतरे में है । भारत और इसके संविधान की अवधारणा खतरे में है ।

अब जरा विचार कीजिए कि इससे कितना सच है । सबसे पहले बात फासीवाद पर करते हैं । भाजपा एक ऐसी पार्टी हैं जो कार्यकर्ता आधारित हैं । पार्टी का एक आम कार्यकर्ता भी उच्च पद पर जा सकता है । पार्टी में किसी एक खास आदमी का वर्चस्व कभी ऐसे नहीं रहा जैसे कांग्रेस में गाँधी नेहरू परिवार का रहता है । एक तरफ जहां कांग्रेस , सपा , बसपा , डीएमके , राजद और तृणमूल आदि पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है तो वही भाजपा में आतंरिक लोकतंत्र बेहद मजबूत हैं । अब साहिबान आप बताइए फासीवादी उस पार्टी को कहेंगे जिसमें लोकतंत्र है या उसको जिसमें लोकतंत्र नहीं हो । परिभाषा के हिसाब से फासीवाद लोकतंत्र का उलट होता है । अब बात कामकाज की करते हैं । कांग्रेस की दस साल चली सरकार और पांच साल की मोदी सरकार के कामकाज की तुलना करे तो अंतर साफ नजर आता है । वो दस साल घोटालों , देश पर आतंकवादी हमलों , देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ चले जोरदार आन्दोलनों के लिए याद किये जाते हैं जबकि मोदी सरकार में कश्मीर को छोड़कर शेष देश के अंदर कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ , सीमा पर सुरक्षा में भी एक आक्रामक बदलाव आया और भारत ने कड़ी निंदा करने की बजाय कड़ी कार्रवाई करने की रणनीति को अपनाया जिससे सेना का मनोबल मजबूत हुआ और लगने लगा कि देश मजबूत हाथों में हैं । सरकार के किसी मंत्री पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है और भाजपा के कुछ ऐसे नेता जिन पर पूर्व में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे वो भी इस बार पाक साफ नजर आ रहे हैं । सरकार के कुछ मंत्रियों ने बहुत अच्छा काम किया है जो बिल्कुल साफ साफ नजर आता है । विदेश में भारत की छवि पहले के मुकाबले अब ज्यादा अच्छी है । देश में कुछ मॉब लिंचिंग की दुःखद घटनाएं हुई हैं लेकिन अफसोस कि इन अपीलकर्ताओं ने उन पर दोहरा मापदंड रखा । ये अखलाक मर्डर पर हो हल्ला करते हैं लेकिन डाँ0 नारंग , चंदन गुप्ता और अंकित सक्सेना की हत्या पर इनको सांप सूंघ जाता है । गौरी लंकेश केरल में हिन्दू संगठनों से जुड़े कार्यकर्ताओं की हत्या को अपने अखबार में स्वच्छ केरलम नाम से एक कार्टून बनाकर जस्टिफाई करती हैं लेकिन जब उसकी हत्या हो जाती हैं तो प्रकाश राज जैसे सितारे बिना किसी जांच के मोदी सरकार को दोषी करार दें देते हैं जबकि गौरी लंकेश की हत्या सरकार के खिलाफ प्रोपेगैंडा चला रहे उनके साथियों ने ही आपसी मनमुटाव के कारण की थी ।

वर्तमान भाजपा सरकार के खिलाफ कोई स्वतः स्फूर्त आंदोलन तक नहीं चला हालांकि प्रायोजित आन्दोलन चलाने की कोशिश बहुत हुई लेकिन असफल रहे तो कैसे माने कि देश में अराजकता है । अब साहिबान आप कह सकते हैं कि गीत , नृत्य , हास्य और कला खतरे में है और कलाकार लोग हैं तो कला को बचाने चले है । जरा साहिबान बताइए कि कैसे खतरे में है ? क्या अब पहले से कम फिल्में बन रही हैं ? क्या भारत में पहली बार फिल्मों का विरोध हुआ है ? साहिबान पद्मावत का विरोध मोदी सरकार में हुआ है लेकिन ऐसा ही विरोध जोधा अकबर फिल्म का भी हुआ था और तब कांग्रेस सरकार थी । कला और संस्कृति के संरक्षण के लिए पदम पुरस्कार दिये जाते हैं अब आप अगर मोदी सरकार के समय के पद्म पुरस्कारों की सूचियां देखेंगे तो उसमें सभी धर्मों , क्षेत्रों और वर्गों के नाम नजर आ जायेंगे लेकिन एक वर्ग नहीं है और वो हैं लॉबिंग करने वाला वर्ग । दरअसल इन हस्ताक्षर करने वालों , अपील करने वालों ने सरकारी चाटुकारिता करके बहुत बार पदम पुरस्कार और भी बहुत से पुरस्कार हड़पे हैं । बैठकर मलाई खाई है और अब वो बंद हो गई तो पेट में मरोड़ होने लगी । दूसरे भारत में रंगमंच क्षेत्र में वामपंथी विचारधारा का बेहद दखल है । कुछ अर्बन नक्सली देश को सुलगाने में लगे थे उनके खिलाफ कार्रवाई से भी ये लोग डर गए हैं कि अगला नंबर हमारा हो सकता है तो विरोध पर उतर आये । यह विचारधारा थोड़ी पाकिस्तान परस्त है तो हिन्दू संस्कृति के बेहद खिलाफ हैं तभी तो देश आजाद होने के कुछ समय बाद ही वामपंथी बलराज साहनी की एक फिल्म आयी थी गर्म हवा जिसमें बटवारे के बाद पाकिस्तान नहीं जाकर भारत में रहने वाले एक मुस्लिम परिवार की घुटन को दिखाया गया था । अब जरा सोचिए कि वामपंथी फिल्मकारों का पचास के दशक से दमित मुस्लिम समुदाय देश में राष्ट्रपति , उपराष्ट्रपति , मंत्री और मुख्यमंत्री जैसे उच्च पदों पर भी पहुंच गया । अब खुद सोचिये गर्म हवा जैसी फिल्म किस मानसिकता से बनायी गई थी । दरअसल इन लगभग 900 अपीलकर्ता लोगों में शामिल हैं देशविरोधी , हिन्दू विरोधी और चाटुकारिता करके मलाई खाने वाले । अब इनको वहीं गर्म हवा टाइप घुटन हो रही हैं तो ये अपनी हताशा बयान कर रहे हैं । अब साहिबान आप कह सकते हैं कि सब ठीक है लेकिन अजीबोगरीब क्या था ? अरे भाई देश में लोकतंत्र है , अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हैं तो कर दी अपील । तो साहिबान ऐसे ही क्यों ? चुनाव में हिस्सा ले रही विपक्षी पार्टियों के स्टार प्रचारक बनकर सरकार के खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके से प्रचार कीजिये । चुनाव लड़ें । दरअसल जो इन लोगों ने किया है वो दुष्प्रचार है और तथ्य हीन है सो अजीबोगरीब है ।

धन्यवाद