केन्द्र और राज्य की सरकारें शराबियों पर मेहरबान-हमारे कामगार परेशान-सरकारी ‘लॉक-डाउन’ हलकान; सभी सरकारें दिखतीं बेईमान

मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय

पृथ्वीनाथ पाण्डेय :

केन्द्र और राज्य-सरकारों को जनसामान्य के लिए रोटी-कपड़ा-मकान की चिन्ता नहीं है; परन्तु शराबियों पर सरकारें मेहरबान हैं। ऐसा इसलिए भी कि सरकारों की आर्थिक स्थिति चरमरा चुकी है; एकमात्र सहारा ‘शराबियों के हाथों में बड़ी संख्या में पकड़ायी जा रहीं शराब की बोतलें हैं। क्या ‘रेड ज़ोन’, क्या ‘ग्रीन ज़ोन’ तथा क्या ‘ऑरेंज ज़ोन’, शराबी ‘शारीरिक दूरी’ की धज्जियाँ उड़ाते हुए, एक नहीं, पाँच-पाँच बोतलें लेकर ‘वेण्टिलेटर’ पर लेटाये गये सरकारी ख़ज़ाने की ‘बदहाली’ को ‘ख़ुशहाली’ में बदलने के लिए दृढ़-प्रतिज्ञ दिख रहे हैं।

लगभग ४० दिनों से जिस शैली में ‘देशबन्दी’ का ढिंढोरा पीटा गया है, वह शोचनीय स्थिति है; और वह भी ‘मध्यम वर्ग’ के लिए। ऐसा इसलिए कि ‘निम्न वर्ग’ पर सरकारें मेहरबान रही हैं और ‘उच्च वर्ग’ की स्वयं की सुदृढ़ व्यवस्था रहती है; इन दोनों पाटों (निम्न और उच्च वर्ग) के बीच में ‘मध्यम वर्ग’ ही पिसा जा रहा है। सरकारें अच्छी तरह से जानती हैं कि मध्यम वर्ग ही ऐसा है, जो ‘विश्वसनीय’ नहीं होता, इसलिए नितान्त क्षुद्र स्वार्थ की पूर्ति के लिए ‘टुकड़े’ फेंककर अपनी ओर कर लो और उसे भुला दो। आज़ादी के बाद से यही होता आ रहा है। वैसे भी बीच में रहनेवाली सजीव-निर्जीव की स्थिति कभी विश्वसनीय नहीं होती। अब ‘त्रिशंकु’ को ही देखिए न, कब से ‘धरती और आकाश’ के ‘बीच’ लटका हुआ है।

मध्यम वर्ग की आय के सभी स्रोत स्थगित हैं; समाप्त हो रहे हैं; समाप्त हो चुके हैं, फिर भी उसका ‘ग़ज़ब’ का धैर्य देखिए, चाह कर भी सरकारी सहायता के लिए हाथों को फैला नहीं पा रहा है और दूसरी ओर, बेईमान सरकारें उसके लिए ‘कुछ भी’ नहीं सोच रही हैं । हाँ, मध्यम वर्ग के अन्तर्गत मानसिक स्तर पर ऐसे भी ‘निरीह’ लोग हैं, जो लज्जारहित होते हैं।

शासकीय राजस्व में सर्वाधिक हिस्सा ‘मध्यम वर्ग’ का होता है। ऐसे में, कृतघ्न सरकारों को समदर्शी बनना होगा और इस संक्रमणकाल में ‘बिना किसी भेदभाव को बरते ‘मध्यम वर्ग’ का संरक्षण करना होगा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ मई, २०२० ईसवी)