निराला के जन्म-दिनांक (२१ फ़रवरी) पर विशेष प्रस्तुति
● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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इलाहाबाद का नाम आते ही प्रथम पंक्ति मे जिस साहित्यिक अक्खड़ हस्ताक्षर का नाम-रूप दिखता है, वह सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का है। मेदिनी, (बंगाल) मे २१ फ़रवरी, १८९६ ई० को जन्म लेनेवाले सूर्य कुमार ने ‘सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के नाम-रूप से इलाहाबाद को अपनी कर्मभूमि के रूप मे ग्रहण किया और कर्मयोगी का जीवन जीते हुए, यहीँ पर १५ अक्तूबर, १९६१ ई० को उनकी जीवनलीला भी समाप्त हो गयी थी।

आरम्भ मे, उन्हेँ हिन्दी-भाषा का ज्ञान नहीँ था; परन्तु मात्र १४ वर्ष की अवस्था मे उनका विवाह मनोहरा देवी के साथ होना, उनके लिए सुखद था। ऐसा इसलिए कि उनकी पत्नी मनोहरा देवी एक सुसंस्कृत और विदुषी थीँ और धाराप्रवाह हिन्दी-वाचन करने मे दक्ष भी।उनकी प्रतिभा और मेधा देख-समझकर, सूर्य कुमार की बाँछें खिल उठती थीँ। वे उन्हीँ के पास बैठकर वाचन और लेखन-स्तर पर अपनी हिन्दीभाषा परिष्कृत करते थे। उन्होँने पत्नी की ही प्रेरणा से मात्र २० वर्ष की अवस्था मे ‘जुही की कली’ नामक काव्यात्मक कृति का प्रणयन किया था। जब सूर्यकुमार २३ वर्ष के थे तब उनकी पत्नी मनोहरा देवी का शरीरान्त हो गया था।
प्राय: देखा गया है कि पति को सन्मार्ग पर चलने के लिए पत्नी ही प्रेरित करती आयी है और उस पथ पर चलते हुए, वह पति एक दिन ‘महापुरुष’ के रूप मे सुख्यात हो जाता है। इस तरह के अनेक उदाहरण हैँ– कालिदास, तुलसीदास। हम यहाँ सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ को भी उसी पंक्ति मे स्थान दे सकते हैँ।
दारागंज, इलाहाबाद मे निवास करनेवाले अक्खड़ और यथार्थवादी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ को हिन्दी-खड़ी बोली का ज्ञान करानेवाली उनकी सुसंस्कृत और विदुषी पत्नी मनोहरा देवी ही थीँ, जिनका समादर करते हुए, निराला ने एक विद्यार्थी के रूप मे हिन्दी-भाषा की समझ विकसित की थी; क्योँकि बंगाल-निवासी निराला की मातृभाषा बांग्ला थी और मनोहरा देवी की हिन्दी; क्योँकि वे रायबरेली की थीँ।
एक बार की बात है, जब मनोहरा देवी निराला को हिन्दी सिखाने के क्रम मे उन्हेँ कई बार टोकती रहीँ तब अपने हिन्दी-अज्ञान के कारण हीन भावना से ग्रस्त निराला फट पड़े थे– जब देखो तब तुम हिन्दी का लट्ठ लेकर मेरे पीछे पड़ी रहती हो। आख़िर तुम्हारी हिन्दी मे है क्या? इसपर मनोहरा देवी ने प्रतिक्रिया करते हुए कहा था– जब तुम्हेँ हिन्दी आती ही नहीँ तब कुछ भी नहीँ है। इसपर प्रश्नात्मक स्वर मे निराला बोल पड़े– मुझे हिन्दी नहीँ आती? मनोहरा ने उस प्रश्न को लपकते हुए कहा था– यह तो तुम्हारी ज़ुबान ही बतलाती है। बैसवाड़ी बोल लेते हो; तुलसी की रामायण पढ़ी है, बस। तुम खड़ी बोली क्या जानते हो? निराला ने चुप रहने मे ही अपनी भलाई समझी थी; क्योँकि वास्तव मे उन्हेँ खड़ी बोली की समझ नहीँ थी।
निराला को अपने जीवन मे अर्द्धांगिनी मनोहरा देवी के वैदुष्य के अभाव का अनुभव तब हुआ था, जब वे चिर-निद्रा मे विलीन हो गयी थीँ। अन्तत:, निराला के शब्द फूट पड़े थे– जिसकी मैत्री की दृष्टि क्षणमात्र मे मेरी रुक्षता को देखकर मुस्कुरा देती थी; जिसने अन्त मे अदृश्य होकर मुझसे मेरी पूर्ण परणीता की तरह मिलकर, मेरे जड़ हाथ को चेतन हाथ से उठाकर दिव्य शृंगार की पूर्ति की, वह सुदक्षिणा प्रिया प्रकृति दिव्य धामवासिनी हो गयी।
घोर हठधर्मी होते हुए भी निराला ने अपनी भार्या मनोहरा देवी के वैशिष्ट्य को स्वीकार किया था, अपनी रचना की इन पंक्तियोँ के माध्यम से– “रँग गई पग-पग धन्य धरा,
हुई जगमग मनोहरा।”
कालान्तर मे, वे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क मे आये, जहाँ से वे सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के रूप मे विश्रुत हुए थे। आचार्य ने १९२० ई० मे ‘बंगभाषा का उच्चारण’ नामक लेख प्रकाशित किया था। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी की प्रेरणा से ही उन्हेँ ‘श्रीराम कृष्ण मिशन’ की पत्रिका ‘समन्वय’ का सम्पादन-दायित्व सौँपा गया था। वहीँ उन्हेँ विवेकानन्द के जीवनदर्शन का बोध हुआ था। उन्होँने ‘सुधा’ का भी सम्पादन किया था। इस बीच, वे इलाहाबाद के तत्कालीन साहित्यकारोँ-कवियोँ के साथ जुड़ चुके थे। वे साहित्यकारवृन्द के आग्रह पर १९४२ ई० मे इलाहाबाद आ गये थे।
इलाहाबाद मे उन्हें सर्जन का अनुकूल धरातल मिला। दारागंज, इलाहाबाद मे पण्डे-पुजारी, मल्लाह, यादव, फल-फूल, साग-सब्ज़ी बेचनेवालोँ के बीच रहते हुए, निराला ‘खाँटी’ निराला बन चुके थे। यही कारण है कि यहीँ रहकर निराला ने ‘अपरा’, ‘नये पत्ते’, ‘बेला’, ‘अर्चना’, ‘आराधना’ आदिक काव्यकृतियोँ और ‘चतुरी चमार’, ‘सुकुल की बीबी’ इत्यादिक कथात्मक कृतियोँ के प्रणयन किये थे।
प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, वाचस्पति पाठक इत्यादिक साहित्यकारोँ के साथ गहरा जुड़ाव उनके साहित्य-संसार को समृद्ध करता रहा।
महादेवी वर्मा एक प्रकार से उनकी देख-भाल करती थीँ। वे राखी के दिन प्रतिवर्ष महादेवी के हाथोँ से राखी बँधवाते थे। और एक दिन महाप्राण निराला, मतवाला तथा फक्कड़ निराला १५ अक्तूबर, १९६१ ई० को अपने चाहनेवालोँ को रोता-बिलखता छोड़, इस दुनिया से कूच कर गये, यद्यपि उनके ‘स्वर’ आज भी साहित्याकाश मे गुंजायमान हैँ :–
“अभी न होगा मेरा अन्त,
मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु दिगन्त
अभी न होगा मेरा अन्त।”
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