पिछले दिनों उत्तरप्रदेश में आयोजित टी०ई०टी०-परीक्षा प्राथमिक स्तर की ‘प्रश्नपुस्तिका में प्रश्नपत्र तैयार करानेवालों के प्रश्न लिखने की शैली और उनके भाषा-व्याकरण-संज्ञान पर भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने चुनौती के अन्दाज़ में प्रश्न खड़े किये हैं, जो निस्सन्देह सत्य साबित हो रहे हैं। इतना ही नहीं, डॉ० पाण्डेय ने प्रश्नों के विकल्पों पर और सम्बद्ध विभाग की ओर से जारी प्रश्नों में से कुछ पर अपनी तार्किक और ताथ्यिक दृष्टि भी डाली है। प्राथमिक स्तर की परीक्षा ‘सी’ प्रश्नपुस्तिका का प्रश्न ४६ (हिन्दीभाषा) का उत्तर (१) अलंकरण ही होगा; क्योंकि दिये हुए गद्यांश में कहीं पर भी ‘अलंकरण’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। वह प्रश्न है, सम्प्रेषण-कला क्या नहीं है? इसका उत्तर विकल्प (४) के रूप में उसी गद्यांश में दिया गया है, जिसमें ‘अलंकरण’ शब्द का कहीं उल्लेख नहीं है। इससे ज़ाहिर होता है कि इस प्रश्न का उत्तर जारी करनेवाले व्यक्ति को प्रश्न की समझ ही नहीं है :– प्रश्न ‘हाँ’ में है अथवा ‘नहीं’।
इसी तरह से ‘बाल विकास और शिक्षण विधि’ विषय की प्रश्नसंख्या ९ देखें :– समावेशी कक्षा में किस प्रकार का/ के छात्र शामिल होता है/होते है/हैं? इसका उत्तर ‘केवल विशिष्ट छात्र’ बताया है, जबकि सही उत्तर विकल्प (१) सामान्य और विशिष्ट छात्र हो सकता है। ऐसा इसलिए कि ‘समावेशी शिक्षा’ एक पद्धति है, जिसके अन्तर्गत दिव्यांग, सामान्य तथा विशिष्ट छात्र-छात्राएँ आती हैं। इस तरह से पहले विकल्प में ‘सामान्य’ से पहले ‘दिव्यांग’ का भी उल्लेख करना चाहिए था, जो कि ‘शासकीय आदेश’ भी है। ऐसे में, इसके सभी विकल्प ग़लत सिद्ध होते हैं और सभी परीक्षार्थियों को पूरे अंक मिलने चाहिए। इसी प्रश्न में ‘होते’ के साथ एकवचन की क्रिया ‘है’ का प्रयोग है, जबकि बहुवचन ‘हैं’ का प्रयोग होगा। प्रश्न ३१ में चौथे विकल्प के रूप में ‘उद्धवशतक– भारतेन्दु हरिश्चन्द्र’ को सही जोड़ा ‘नहीं’ बताया गया है। प्रथम दृष्टि पड़ने पर यह सही लगता है; किन्तु यह विकल्प भी ग़लत है; क्योंकि भारतेन्दु जी अपने नाम में ‘हरिश्चन्द’ का प्रयोग करते थे, न कि ‘हरिश्चन्द्र’ का। अब प्रश्न ३९ को देखें :– ‘गौशाला’ में कौन-सा समास है?’ शुद्ध शब्द ‘गो’ है, न कि ‘गौ’। इस प्रकार ‘गोशाला’ शब्द शुद्ध है, न कि ‘गौशाला’।
संस्कृतभाषा की प्रश्न-संख्या ६५ के विकल्प (१) छाछठ और (२) सरसठ को समझें। इन दोनों की वर्तनी अशुद्ध है; शुद्ध है– ‘छियासठ’ और ‘सड़सठ’। प्रश्न ६९ में ‘कालिदास द्वारा’ का प्रयोग है, जो कारकीय दृष्टि से अशुद्ध है; शुद्ध है— ‘कालिदास के द्वारा’/’कालिदास-द्वारा। प्रश्न ८४ देखें :– ‘बगुले’ को संस्कृत में कहते हैं’ इसके वाक्यान्त में विरामचिह्न की घोर उपेक्षा है। ‘पर्यावरणीय अध्ययन’ विषय की प्रश्नसंख्या १४० के विकल्प दो,तीन तथा चार देखें :– तीनों में ‘वैज्ञानिक’ के स्थान पर ‘विज्ञानी’ का प्रयोग है; क्योंकि व्याकरण की दृष्टि से ‘विज्ञानी’ ही संज्ञाशब्द है। इस परीक्षा में जितने भी विवरणात्मक प्रश्नात्मक वाक्यों का प्रयोग किया गया है, उनमें लगभग ९७ प्रतिशत प्रश्नों में विवरणचिह्न (:–/:) नहीं लगाया गया है। इतना ही नहीं, किसी भी पूर्ण वाक्यवाले विकल्प में पूर्ण विराम का चिह्न (।) का प्रयोग नहीं किया गया है, जो कि ‘विरामचिह्न-प्रयोगदोष’ है। जैसे– प्रश्न ६ और ७ के सभी विकल्पों को देखा जा सकता है। अधिकतर जिन प्रश्नों में ‘निम्न में से’ शब्दावली का प्रयोग किया गया है, वहाँ ‘निम्नलिखित/निम्नांकित/अधोलिखित’ का प्रयोग होगा। योजक-चिह्न (-) की भरपूर उपेक्षा की गयी है। डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने विद्यार्थियों को आगाह किया है कि बाज़ार में जाकर सामान्य हिन्दी की उसी पुस्तक को ख़रीदें, जिनसे उनके उद्देश्य की बहुविध पूर्ति हो; साथ ही ‘गूगल’ पर भरोसा न करें; सभी ने अज्ञान बाँटने की अपनी/अपनी दूकान खोल रखी है।