धनत्रयोदश का औचित्य और विधान

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

शुद्ध शब्द है, ‘धनत्रयोदश’, जिसका तद्भव (उससे उत्पन्न) शब्द ‘धनतेरस’ कहलाता है। इस धनत्रयोदशी को भगवान् धन्वन्तरि के साथ सम्बद्ध करके समझा जा सकता है। संस्कृत-भाषा के शब्द ‘धनु’ और ‘अन्त’ के योग से ‘धन्वन्त’ का सर्जन होता है, जो कि षष्ठी तत्पुरुष का उदाहरण है। अब ‘धन्वन्तरि’ की रचना करने के लिए ‘ऋ’ धातु में ‘इ’ का योग करना होगा। ‘ऋ’ का अर्थ ‘गति करना’ है। इस प्रकार संज्ञाशब्द ‘धन्वन्तरि’ की उत्पत्ति होती है।

स्मरणीय है कि कार्तिक-मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी तिथि में ‘समुद्र-मन्थन’ करते समय ‘अमृतकलश’ लेकर भगवान् धन्वन्तरि प्रकट हुए थे। इसी तिथि का नामकरण ‘धनत्रयोदशी’ किया गया था। उन्हें भगवान् इसलिए कहा गया है कि वे भगवान् विष्णु के अवतार माने गये हैं। भगवान् धन्वन्तरि को जरा (बुढ़ापा), रुजा (रोग; अशक्त) तथा मृत्यु (शरीरान्त) के नाशक और अमरत्व प्रदाता कहा गया है। इस तिथि में उनकी आराधना कर, स्वास्थ्यवर्द्धन की कामना की जाती है। भारत में इसी तिथि को ‘राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस’ के नाम से आयोजित किया जाता है।

प्राचीनतम वेद ‘ऋग्वेद’ का एक मन्त्र है, जिसमें लक्ष्मी-पति विष्णु की अभ्यर्थना की गयी है; समझें,
“ऊँ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर।
भूरिरेदिन्द्र दित्ससि।
ऊँ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्।
आ नो भजस्व राधसि।।”
भावानुवाद– हे लक्ष्मीपति विष्णु! आप महान् दानी हैं। आप्तजन (विश्वसनीय जन) से हमने सुना है कि संसार से निराश होकर जो जन आपका पूजन-अर्चन करता है, आप उसकी प्रार्थना स्वीकार कर, उसके आर्थिक अभाव को दूर कर देते हैं। हे भगवन्! मेरा संकट हर ले!

इस श्लोक के निहितार्थ से स्वयं को पृथक् करके सारगर्भित विचार करें तो निष्पत्ति प्राप्त होती है कि भगवान् धन्वन्तरि ‘आयुर्वेद के जनक’ माने गये हैं; देव-देवियों के वैद्य के रूप में प्रतिष्ठित हैं, इसलिए उनकी आराधना का आशय है, समाज अपने स्वास्थ्यलाभ-हेतु उनसे कामना कर रहा है, जबकि स्थिति पूर्णत: विपरीत दिखती है, जनसामान्य स्वयं के लिए धन-धान्य की समृद्धि का अभिलाष है। धन्वन्तरि को चौदहवाँ रत्न भी माना गया है; क्योंकि समुद्रमन्थन करते समय चोदहवें रत्न के रूप में धन्वन्तरि का अवतरण हुआ था।

विचारणीय विषय यह है कि अधिकतर समाज ‘धनत्रयोदशी’ का न तो अर्थ जानता है और न ही उसे अभिप्राय-अवधारणा तथा आशय का बोध रहता है। उस तिथि में नयी वस्तु, विशेषत: बरतन, वाहन, आभूषणादिक का क्रय करे, एकमात्र उद्देश्य रहता है। यह भी एक प्रकार की अशिक्षा है, जो सुशिक्षित-वर्ग में अपेक्षाकृत बहुत अधिक प्रचलित है, जो कि दु:खद और चिन्त्य पक्ष हैं। अधिकतर सुशिक्षितजन को ‘धन्वन्तरि’ के नाम और कार्य का बोध नहीं रहता और जिन्हें रहता है, वे यह बता सकने में समर्थ नहीं रहते कि धन्वन्तरि का ‘धनत्रयोदश’ के साथ किस प्रकार का सम्बन्ध है।

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २ नवम्बर, २०२१ ईसवी।)