बरखारानी के नावे आचार्य पृथ्वीनाथ पाण्डेय के एगो चिट्ठी

हमार बरखारानी!
जीयत रह।

आ हेने के हाल-चाल ठीके बा। आपन सुनाव। आ जान तारू। तहरा के सइगर देखले, एक साल हो गइल। एने पाता चलल हा कि आपना रिसतेदारी में तू आइल रहलू हा आ छीटा-पानी देइके, सभके देखि-दाखि के लउट गइलू हा। तहार परेम मिलल बहुत दिन होइ गइल बा। इहो पाता चल ता कि तू एने-ओने बरियारी से पेरेम-परसाद बाँट तारू।

आ हे बरखारानी! सब जगहीया तनी बरियारी से आपन परसदिया बरसाव न।

आहि ए दादा! बाह रे बरखवा बाह! तोरा गोड़वा में सनीचर के पहीया लागल बा। तू मुंबई धूमतारू भा अइसे जान ल, उड़ तारू। बुझा त तहरा के चौपटिए नीक लागे लागल। अरे तनी हेनियो एगो उधारि के कनखी मार ना? तू त बाड़ा तिरछोल निकललू हो।

देहिया के पसीनवा एतना चूवता कि बुझाये लागल की तूहीं देहिया में समाईल बाड़ू। होने सुरुज माहाराज लाल-पियर टमाटर लेखा मुँहवा बनावले झोंकरा तारे। बाकिर तू ना जाने कपूरवा की टिकियवा लेखा केने उधियाईल फिरतारू। अरे बबुनी! डेगरौना लेखा काहें डेगरा तारू। तनी सोझ चलिया देखाव ना। एक हाफता बरसबू तबे धरती माई के करेजा ‘कोलड डिरिंक’ लेखा ठण्ढाई। बाकिर जानि ल तू, बाड़ा गजन होख ता। तू आपनु महातम देखाइ के जइसे भागेलू, सुरूज महाराज बदरिया के आँचरवा सरकाई के बसुधा रानी के कनखी मारे लागे ल। इ कह कि सौतियाडाह के कारन बिजुरिया सुरूज महाराज के एको ना चले देले। अइसन तड़के लागेले कि सुरूज महाराज के हावा टाइट हो जाला।
अरे ससुरी! ढेर गजन करबे नू त समुझि लीहे, तोरा के फोरि-फारि के अकोर कई दीहल जाही। तें बाड़ा पगलेट बाड़े आ थेथरो। तें मनसहक बुझ तारे?

आ तोर इहो बतिया ठीके बा। इ सार नेतऊवन फेंड़ के फेंड़ कटवाइ के देस के हेनर-बेनर करे खातिर जुटल बाड़न स। हामरा त इहो लागता कि जइसन आपन,आ आपन खानदान के मइजल बनावे आ देहिया जरावे खातिर लकड़ी बटोर तारन स।

तहरो खीसियाइल कवनो बेजा काम ना कहाई। काँहें से कि परिकिरित के साथे जेतना-जेतना अनेति होखता, ओकरि कीमतिया त देबहीं के पड़ी। जीइ के देस लोग भा मुइ के देस।
त ठीके बा; एमे कवनो गड़बडेसन नइखे। अबसे तें ताल ठोंकि कि आपनि रहतिया भुलाइल रहु। हम हरमुनिया आ ढोलक बजाइ के तोरा साथे-साथे चलब। ते गइहे— हे गांगा मइया! तोहे पियरी चढ़इबों, नेतवन से कई दे मिलानवा जय सिरीराम।

इ सार लोग एही लायक बाड़े। अइसन पाठु पढ़हिहे कि तोरा पजरी जाये में बेईमनवन के हाबा-डाबा होखे लागे।
आ झरिहे त अइसन कि जेने-जेने आँखि माहारानी जासु ओने-ओने खाली तेहीं-तेहीं भेंटाऊ।

ए बरखवा! पी०एम०ओ० आ संसदीया के तें अइसन सभाखन करू कि खदर पहिन के संसदिया में ‘गोंड़वन के नाच’ लेखा नाचे लागस लोग। अब तोरे ऊपर बावे,इनहन के अइसन ककन छोड़ाव कि दिमागि ठेकान पर आइ जाउ। काँहें से कि तोरा के अनेर-बनेर आ अकोर करे में इ दूनों जगहिया के नेतउअन के कुल्हि हाथवा बा। ओही में साता पच्छ आ बिपच्छ के छपाकि-छपाकि होखे लागे; काहे के महटियाव तारू? सुरू कर आपन खेलवा!

तोर हड़ाह परेमी– पिरीथिबीनाथ पाँड़े

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २६ जून, २०२० ईसवी)