मुझे इन्सान ही बना रहने दो तुम

जगन्नाथ शुक्ल, इलाहाबाद

उत्कृष्टता की थाह न है,
मुझे इन्सान ही बना रहने दो तुम।

घने जंगल के दरख़्त की तरह,
मुझे अहर्निश खड़ा रहने दो तुम।

जहाँ मन मे न हो गुमान कोई,
हर मुश्किल में अड़ा रहने दो तुम।

अहम की है जिसमे गन्दगी यारों!
उसको ही बड़ा रहने दो तुम।