● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
उनकी निगाहों के सुरूर१ अब बोलने लगे,
वे कितने पानी में हैं, लोग अब तोलने लगे।
वे आर्ज़ूमन्द२ हैं, मताए दिल३ ख़ुशगवार रहे,
बेशक, डर है, ईमान कहीं अब डोलने लगे।
चलो! एक बार फिर क़दम मिलाके बढ़ते हैं,
गठरी इश्क़ की पाक़ीज़गी से खोलने लगे।
यह बाज़ार नहीं, महब्बत का पाक मन्दिर है,
यहाँ बहुत हैं, जो उल्फ़त को अब मोलने लगे।
वह काज़िब४ है, सँभाल कर ख़ुद को रखना,
ख़ुदा न ख़्वास्त:५ ज़िन्दगी में ज़ह्र घोलने लगे।
शब्दार्थ– १सुखद नशा २उत्सुक ३दिलरूपी पूँजी ४मिथ्यावादिनी ५ख़ुदा न करे।
● प्रयुक्त सभी शब्द शुद्ध और उपयुक्त हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १३ जून, २०२२ ईसवी।)