— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
ऐ फ़क़ीर! अब लौट आ, संकट में है देश।
छल-प्रपंच करता रहा, बदला तूने वेश।
ठगा सभी को प्रेम से, कोयल-वाणी बोल।
पर तू कौआ है दिखा, खुलती तेरी पोल।।
भक्त बहुत हैं भीड़ भी, पर है भीतरघात।
भीतर से सब खोखले, बाहर-बाहर बात।।
जाल भरोसा शिथिल है, डगमग-डगमग पाँव।
मन से बाहर तू गया, जाता जैसे आँव।।
ख़ूब पिलाया देश को, चरणामृत उपदेश।
दाढ़ी बकरा-सा दिखे, कर ले गर्दभ! केश।।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ सितम्बर, २०२० ईसवी।)