
ये जो तुम कहते हो सब स्त्री के कारण है
तो बस भी करो अब
ये अहम है जो किआ तुमने
अपने पौरुष से पहाड़ काट डाला
नदियों को कमर से पकड़
बलपूर्वक मोड़ दिआ रास्ता उसका
ये जो जंगल का हरा चीर खींच
नंगा किआ है तुमने उसको
देखो तो कैसे ज़मीन के गर्भ को
चीरते हो तुम, बस बाजारीकरण के लिए
फिर माता कह भुना लेते हो
इस सम्बन्ध को भी
सौप दो ये धरा स्त्री को
पौरुष से नहीं चलेगी ये
ये जो रास्ते निकाले तुमने पहाड़ के सीने में
ईश्वर तक पहुंचने को
अब आस्था नहीं पहुँचती वहां
इन रास्तो से बस धन पहुँचता है
तालाब और कुंओ के अनेको गीत
स्त्रियां जो गाती थीं
सब दबा दिए तुमने पाट के
झूले नोंच लिए तुमने
काट डाला जहाँ टंगे थे उस शाख को
कितने निर्मम हो तुम
सौप दो ये धरा स्त्री को
पौरुष से नहीं चलेगी ये
ये जो रंग भरते हो तुम
उस नदी में केशो के बीच
बस एक चिन्ह लगा देना है
अपनी प्रभुता का वहां
प्रेम नहीं अधिकार जता देना है
प्रेम में पड़े उस मृग को
जिसे देख ना पाए तुम प्रेम में
मृगिनी को अपने तीर से
आहत कर पौरुष जताया है तुमने
अपनी कला को नहीं निखारा
सौप दो ये धरा स्त्री को
पौरुष से नहीं चलेगी ये
कितने ऊंचे ऊंचे झंडे गाड़े है
देखो जैसे जीतने की चाह
हो हर क्षण, हर क्षेत्र
ये विजय आवश्यक है क्या
तुम प्रेम में नहीं रह सकते
बस बिना विजय के
बस प्रेम में
पहाड़ों के नदियों के प्रेम में
इस मिट्टी और रेत के प्रेम में
पत्थर और ईश्वर के प्रेम में
मृग और मृगनी के प्रेम में
नहीं रह सकते
तो सौप दो ये धारा स्त्री को
पौरुष से नहीं चलेगी ये
वो बो देगी प्रेम अपना
कोख में भी मिट्टी में भी
ढक देगी जंगलों को
हरी चुनर से
और रंग बिरंगी ओढ़नी से
इस पृथ्वी को
लीप देगी गोबर और गेरू से
उन लकीरो को जो खींच
शरीर बाट दिआ तुमने पृथ्वी का
बना देगी रंगोली हर जाति से
थोड़ा थोड़ा रंग ले के
गीत तालाब और कुंओ के
फिर बज उठेंगे ढ़ोल पे
मृगिनी फिर वत्सल हो जाएगी
सौप दो ये धारा स्त्री को
पौरुष से नहीं चलेगी ये