अर्ज़ किया है

एक–
इधर चंचल हवा, उधर शोख़ अदा,
हालात बन गये, जाएँ तो कहाँ जाएँ ?
दो–
शाम का घनेरा ग़ज़ब, हवा के तेवर कसे हुए,
एक ग़रीब के कफ़न से, सूरज ने आँसू पोछे हैं।
तीन–
मैने ख़त मे इन्क़िलाबी सूरज उगा के भेजा है,
हर हर्फ़१पे बच्चों को सुलाते रहना।
चार–
हवा मे साज़िश घोलने की ख़बर आयी है,
आहट लिये रहना, हर मौसम हरजाई है।
पाँच–
मै शाइर नहीं, फिर शे’र क्यों कहूँ?
मतवाला मिजाज़, साथ लेकर चलता हूँ।

शब्दार्थ :– १अक्षर।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २५ दिसम्बर, २०२३ ईसवी।)