कविता : तन्हा दिल

तन्हा दिल है न जाने कब से ,
तुम मिलकर भी न मिल पाए।
तन्हा है दिल न जाने कब से ,
तुम छोड़ कर भी ना छोड़ पाए।
तन्हा है दिल न जाने कब से,
तुम देख कर भी नजर ना मिला पाए।
तन्हा है दिल न जाने कब से,
तुम प्रेम करके भी प्रेम ना निभा पाए।
तन्हा है दिल न जाने कब से,
तुम बातें करके भी हमें ना समझ पाए।
तन्हा है दिल न जाने कब से,
तुम गलती से भी याद ना कर पाए।
तन्हा है दिल न जाने कब से,
तुम सोच कर भी हमारे बारे में नहीं सोच पाए।

संजना
11वीं कक्षा की छात्रा
कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश।