जग का दुःख है रोया हमने,
अपना दुखड़ा भूल गये।
उस पथ के पथराही हैं हम;
जिस पथ में नित शूल नये।
सारा सावन आँखों में ही,
रुक कर मानो सूख गया।
इतने पर भी जी न माना ,
उसको लगता वो चूक गया।
जीवन लगा दाँव पर हमने,
पल भर की खुशियाँ माँगी।
उनको लगा कि मानो हमने;
उनकी सारी दुनिया माँगी।
भटकन में ही बचपन बीता;
चौराहे पर खड़ी जवानी।
दूर रहे नित चकाचौंध से;
फिर भी ये मेरी नादानी।
नहीं सफ़ल ग़र जीवन तो;
सारे नाते निर्मूल हुये।
अगर टूट जायें थोड़े में;
सबकी नज़र में धूल हुये।
जग का दुःख है रोया हमने,
अपना दुखड़ा भूल गये।
©जगन्नाथ शुक्ल…✍ इलाहाबाद