आकांक्षा मिश्रा-
तुम्हें….!!
कभी-कभी चिठ्ठियाँ लिखा
करुँगी ।
चिठ्ठियाँ तुम्हारे नाम की
पता मेरे घर का ही होगा
पढ़कर खुश तुम होना
कुशल मेरे परिजन का ही होगा ।
सिहर जायेगा हृदय…….
ये जानकर , तुम्हारे द्वार पर
दिया आज भी जलता हैं मेरे हाथों से ।
आँगन की तुलसी महकती हैं
किलकती हैं गूँज सुबह -शाम को
लिखूँगी चिठ्ठियाँ सिर्फ तुम्हारे ही नाम की।।
कहाँ हैं आप ?