एक दीप मन में भी जलाएं
भरा जो अंधकार चलो उसे भी मिटाएं
मंदिर ,मस्जिद ,गुरुद्वारे एक साथ बनाए
हिंदू, मुस्लिम ,सिख -ईसाई का भेदभाव मिटाएं
दिल से हटा दें फरेब की फुलझड़ियां
बैर-भाव को भुला बनाएं चलो अपनत्व की दुनिया
एक दीप मन में भी जलाएं
भरा जो अंधकार चलो उसे भी मिटाएं।
जाति पात का भेदभाव मिटाएं
छोटा बड़ा किसी को ना बनाएं
हर एक लड़की को अपनी बहन बनाए
समाज में फैले हुए हर एक दरिंदों को जलाए
एक दीप मन में भी जलाएं
भरा जो अंधकार दिल में चलो उसे भी मिटाएं।
माता पिता को ही भगवान बनाए
वृद्धा आश्रम जैसी कुरीतियों को मिटाएं
भूखे नंगे असहायओं को सहारा दिलाएं
राम रहीम के अंधविश्वास को चलो मिटाएं
एक दीप मन में भी जलाएं
भरा जो अंधकार दिल में चलो उसे भी मिटाएं।

प्रांशुल त्रिपाठी (विद्यार्थी, विधि), रीवा, म०प्र०