फागुन की बयार

 

उषा लाल–

फागुन की बयार मनभावन
पूनम का है चाँद ,
जले होलिका अबकी ऐसी
हर ले सबकी क्लांत !
हो गुलाल रस प्रेम रंग का
पिचकारी में प्रीत!
गले मिलें सब इक दूजे के
गिरा द्वेष की भीत!
दहन करें अपने कष्टों को
आहुति दें पीड़ा की!
रूप निखर जाये उत्सव का
होली बीते ऐसी!
हम सब यूँ समरस हो जायें
भूल सभी बँटवारे!
बृजवासी ज्यों रंग जाते थे
श्याम रंग में सारे!