हस्रतभरी निगाहें

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

★ मिर्ज़ा ग़ालिब ने क्या ख़ूब कहा है :---
"दिल को नियाज़े हस्रते दीदार कर चुके, 
 देखा तो हममे ताक़ते दीदार भी नही।'

यक़ीन नहीं आता,
ख़ुद को देख रहा हूँ।
अतीत, वर्तमान तथा भविष्य के गलियारे में
ढूँढ़ रहा हूँ,
अपने न होकर भी,
हो जाने के साक्ष्य को
पर हर बार
ख़ुद को ख़ुद से
ठगा हुआ पा रहा हूँ।
निगाहों में पांचाली ठहर आती है
और टुकुर-टुकुर ताकतीं
पुरुषार्थ के धनी
पञ्च पाण्डवों की
लाचारगी में सनी
कातर आँखें भी।
मैंने भी नज़रें
झुका ली हैं,
ख़ुद से ख़ुद को हारकर।
देश-काल-पात्र की
रीति ही निराली है।
हार कर भी
मेरी हस्रत धुँधुआती रहेगी
और शोला बनकर
लील जायेगी मेरी
दुर्बलता को।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ जून, २०२२ ईसवी।)