प्रतिनव मिश्र :

रूपए, डॉलर ,अनगिनत मोबाईल एप्स, दर्जनों बैकिंग सॉफ्टवेयर और दिन पर दिन इनके माध्यम से होने वाला लेन-देन। इनसे तो हर कोई वाकिफ है पर, इन सबसे अलग बीते कुछ दिनों के भीतर ही अर्थ जगत में एक ऐसी करेंसी ने जगह बनाई है जिसे न तो आप छू सकते हैं और न ही देख सकते हैं। बावजूद इसके यह करेंसी वैश्विक स्तर पर सबसे मंहगी करेंसी बनी हुई है। हैरानी की बात तो यह है कि कुछ वर्षों के अंदर ही इसकी कीमत डॉलर, रियाल समेत दुनिया की बाकी करेंसी से कई गुना ज्यादा पहुंच चुकी है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसे खरीदने की होड़ में तमाम देशों के नागरिक भी लगे हुए हैं। जी हां, हम बात कर रहें है ऐसी ही एक करेंसी “बिटक्वाइन” की जो आज सफलता के नए मुकाम पर है। दुनिया भर में इसके लाखों ग्राहक मौजूद हैं।
बिटक्वाइन दुनिया की पहली डिसेंट्रलाइज्ड डिजिटल क्रिप्टोकरेंसी है। जिसका उपयोग विश्व भर में कहीं भी, कभी भी किया जा सकता है। इसके जरिए कोई व्यक्ति-किसी व्यक्ति अथवा बैंक, वित्तीय संस्था या एजेंसी (थर्ड पार्टी) को बीच में लाए बिना ही सीधे रकम का लेनदेन कर सकता है। इसके लिए भेजने वाले व्यक्ति को बस मामूली सी रकम बतौर फीस चुकानी पड़ती है। कम समय में ही भेजी गई रकम एक व्यक्ति के बिटक्वाइन वॉलेट से दूसरे के बिटक्वाइन वॉलेट में पहुंच जाती है। इस करेंसी की सबसे खास बात यह है कि इसमें कोई नोट या सिक्के आपके पास नहीं पहुंचते बल्कि कुछ कोड्स आपके वॉलेट में आ जाते हैं। उसे ही रकम कहा जाता है। सामान्य तौर पर होने वाले पैसों के लेन-देन पर बैंक, सरकार और वित्तीय संस्थाएं नजर रखती हैं। इसके लिए ग्राहक से 5% से 30% प्रतिशत तक की मोटी फीस भी वसूल की जाती है। विश्व भर में ऐसे लेन-देन पर 10% तक की औसत फीस ली जाती है। लेकिन बिटक्वाइन के लेन-देन में फीस के नाम पर महज कुछ सेन्ट ही लिए जाते हैं। किफायती होने के साथ ही यह व्यवस्था तेज और सुरक्षित भी मानी जाती है।
क्या और कैसे करती है काम बिटक्वाइन ?
बिटक्वाइन ‘एक डिजिटल मुद्रा’ क्रिप्टोकरेंसी है जो ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर पर आधारित है। इंटरनेट की दुनिया से जुड़े कम्प्यूटर्स के लिए यह पेमेंट का एक नया तरीका है। इसमें पीयर टू पीयर के तहत रकम एक से दूसरे कम्प्यूटर में पहुंचती है। अब ज्यादातार लोग इसे खरीद रहे हैं नतीजतन इसके दाम भी बढ़ते जा रहे हैं। इसकी व्यवस्था का निर्माण ऐसा किया गया है कि एक निश्चित समय के बाद इसकी कीमत अपने आप आधी हो जाती है। शुरूआत में एक ब्लॉक से 50 बिटक्वाइन निकलते थे। प्रति चार वर्ष में इसकी संख्या घट जाती है। इसलिए आज से तकरीबन 125 वर्षों बाद इसका निर्माण बंद हो जाएगा। लेकिन, तब तक 2 करोड़ 10 लाख बिटक्वाइन दुनिया में आ चुके होंगे।
यहां होता है सबसे ज्यादा इस्तेमाल
यह करेंसी मौजूदा करेंसी से समानांतर काम करती है और इस का इस्तेमाल सबसे ज्यादा रेमिटेंस में होता है। रेमिटेंस उस रकम को कहा जाता है जिसे विदेश में रहने वाले लोग अपने देश में भेजते हैं। रेमिटेंस हासिल करने वाले देशों में भारत पहले नम्बर पर आता है। इसके अलावा विदेशों में लोग मोबाइल फोन से लेकर होटल बुकिंग और कार खरीद तक में इसका इस्तेमाल बढ़-चढ़कर कर रहे हैं।
डिजिटल है तो पाइरेसी भी होगी ?
आपके मन में यह सवाल भी जरूर उठ रहा होगा कि यदि बिटक्वाइन डिजिटल है तो इसके साथ पाइरेसी और हैकिंग जैसी समस्याएं भी जुड़ी होंगी। पर, ऐसा नहीं है, बिटक्वाइन डिजिटल और महंगी तो है लेकिन इसकी पाइरेसी और इसे हैक कर पाना बहुत ही मुश्किल है। बिटक्वाइन आम लोगों के बीच बने ब्लॉक चेन्स में भेजा जाता है। जैसे आपके बैंक आपके पैसे का हिसाब रखते हैं वैसे ही बिटक्वाइन का हिसाब ब्लॉक चेन्स में रखा जाता है। किसी भी ट्रांजेक्शन का हिसाब सर्वर पर मौजूद रहता है। हर ट्रांजेक्शन को री-वेरीफाई किया जाता है और नेटवर्क इसका हिसाब रखता है। इसलिए इसमें धांधली और पाइरेसी की संभावनाएं अत्यंत कम हैं। इसे सुरक्षित रखने वाले लोगों को ईनाम के रूप में तकरीबन 12.5 बिटक्वाइन दिए जाते हैं। इस व्यवस्था को माइनिंग कहा जाता है जबकि इसे सुरक्षित रखने वाले लोगों को कोड भाषा में माइनर नाम दिया गया है।
कुछ यूं है इतिहास
3 जनवरी सन् 2009 में बिटक्वाइन की शुरूआत हुई थी। सतोषी नाकामोतो नामक एक प्रोग्रामर ने इसकी शुरूआत की थी। हालांकि इसके जनक की सही जानकारी आज तक किसी को नहीं हो सकी है। अलग-अलग समय पर लोग सतोषी नाकामोतो होने का दावा करते रहे हैं। शुरूआती दौर में इसे एक डिजिटल करेंसी बनाने का लक्ष्य नहीं था। बल्कि बिना किसी थर्ड पार्टी के कानूनी लेन-देन को अस्तित्व में लाना था। 22 मई 2010 को इसकी कीमत 10 सेन्ट से भी कम थी। तब से लेकर आज तक एक क्वाइन की कीमत में हजारों गुना इजाफा हुआ है। इस डिजिटल करेंसी के कुछ खतरे भी सामने आ रहे हैं।
-किसी भी सरकार और एजेंसी का नियंत्रण न होने के चलते कोई भी वित्तीय संस्था इसके प्रति जवाबदेह नहीं है।
-इसके अलावा कई लोग प्रतिबंधित वस्तुएं खरीदने के लिए भी इसका इस्तेमाल करने लगे हैं।
-ड्रग तस्कर और माफियाओं में इसका चलन बढ़ रहा है।
-दो लोगों के बीच का लेन-देन पूर्णतया एनक्रीप्टेड होता है इस वजह से इसे पकड़ पाना आसान नहीं है।
इसके अलावा इनकी कीमत में समय दर समय उतार-चढ़ाव होता रहता है।
एक्स्पर्ट की राय-: दीवान अरशद खान, साइबर एक्सपर्ट-
“डाटा लीक होने का खतरा कहीं न कहीं बना रहता है। इसकी कीमत भी निर्धारित नहीं रहती है। तो खरीद पर कई बार नुकसान होने का डर रहता है। वैसे, इसे खरीदना बहुत ज्यादा मुश्किल नहीं है” ।