निजीकरण से त्रस्त है, शिक्षित युवा समाज

अभी नहीं मैदान तय, ठोंक रहे हैं ताल।
मुझको भी भविष्य में शायद, मिल जाये कुछ माल ।।

चढ़ा बुखार चुनाव का, कर्मठ हुए अधीर ।
नौसिखिये भी हो चले, सैद्धांतिक वीर ।।

सेवा करूँ समाज की, सिर पर भूत सवार ।
उसको लौटाया नहीं, जिसका लिया उधार ।।

मन मसोस कर रह गया, फटे हाल मजदूर ।
पुड़िया, बीड़ी मांग दी, तो देखा आँखे घूर ।।

औरों की कमियाँ रटे, भांज रहे तलवार ।
परपंची, खुरपेंचिया, विधिना लिख्यो लिलार ।।

चेला शक़्कर हो गये, गुरु व्यर्थ बदनाम ।
इंटरनेट हर हाथ में, चलता आठों याम ।।

बिन माँगे ही दे रहे, ‘परिचय’ जोड़े हाथ ।
निर्वचनी मन बावरा, कैसे बने सनाथ।।

ठेका, ठेला, ठेलिया, ठेके पर हर काम।
माथा ठोंक के जप रहा, भोलू प्रभु का नाम ।।

‘मूरख’, जनता मस्त है, खा-खा मुफ्त अनाज ।
निजीकरण से त्रस्त है, शिक्षित युवा समाज ।।

          अवधेश कुमार शुक्ला
     मूरख हिरदय, मूर्खों की दुनिया
      मार्ग शीर्ष पंचमी, कृष्ण
         13 नवम्बर 2022