● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
नूरानी१ चेहरा सोता रहा, चश्मोचिराग़२ रोता रहा। मसाइल३ से वाक़िफ़ रहा ही कहाँ, ख़ुद-से-खुद-को ही ढोता रहा। अन्दाज़े बयाँ चश्मे नम४ का यहाँ, ज़ेह्न५ मे जाने क्या बोता रहा। कश्ती है नाराज़, साहिल भी दूर, लगाता ख़याली६ ही गोता रहा। सवालात मन से उलझते रहे, क्या पाता रहा-क्या खोता रहा। गिरीबाँ७ मे झाँका तो सिफ़र८ दिखा, किया-कराया सब धोता रहा। वीराना घर, जाने गये सब कहाँ, अकेला ही दादा का पोता रहा। फ़ित्रत९ अक्खड़, क़दम बेख़बर, बैलों-सा गरदन मे जोता१० रहा।
क्लिष्ट शब्दार्थ :– १कान्तिमान, २बेटा, ३समस्याएँ, ४आँसू से तर आँखें, ५मस्तिष्क, ६काल्पनिक, ७दामन, ८शून्य, ९स्वभाव, १०जुआठे मे बँधी हुई रस्सी, जिसमे बैलों की गरदन (‘गरदन’ शब्द अनुपयुक्त है।) फँसायी जाती है।
सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३१ अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)