कृष्ण प्रिया-
क्या लौट आई थी प्रतिध्वनि मेरी!
स्वर न हो सका शंखनाद!
उस दिन ख्वाबों के घाट
तुम ही तो चले आए थे न श्याम
मेरी आंखों में अविश्वास घनेरे थे
कैसे करती विश्वास
छोड़ कर अंबर को
धरती पर कैसे शंशाक?
पर तुमने ही नियति के विरूद्ध लिखी कथा नयी
अद्भुत अभिभूत करती तुम्हारी अनकही
मैं रचती रही जो कभी कही ही नहीं
नियति का ही संजोग, तुम कण कण में
जीवन की इस विश्रांत संध्या में मिले मुझको
अनंत में ही था सामर्थ्य जो रोक ले हवा को
आज अभिनव दीप जलाया
उन ख्वाबों को लहरों पर सजाया
सामर्थ्य तो तुम्हीं में न कान्हा
किस कश्ती को मिले किनारा
लो आज प्रवाहित सारे दुख
निश्छल रहेगी प्रार्थना!
पर एक प्रश्न रहेगा शाश्वत, मेरे मरने के बाद भी!
कि वह तुम थे या नियति का परिहास कोई।