ठगी-ठगी, शह-मात रही

चिन्दी-चिन्दी रातेँ पायीँ,
फाँकोँ मे मुलाक़ात रही।
मुरझायीँ पंखुरियाँ देखीँ,
सहमी-सकुची बात रही।
बेमुराद हो आँसू छलके,
याद पुरानी घात रही।
बूढ़े ज़ख़्म कुरेद रहे थे,
बची-खुची बस रात रही।
दौड़ा-धूपा; हाथ न आया,
परवशता की लात रही।
पेट था भूखा, बोल न पाया,
सूखी-सूखी आँत रही।
शातिर-चाल समझ न पाया,
ठगी-ठगी शह-मात रही।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ अक्तूबर, २०२४ ईसवी।)